Monday, 13 January 2014

सुधियों के बिखरे पन्ने :-एक थी सुधा

Sudha Raje wrote a new note:
सुधियों के बिखरे पन्ने :-एक थी सुधा एक
थी गुड्डो .
Sudha Raje
चिट्ठियाँ
***-****
संगीत उसकी पहली पसंद थी और
कविता प्राण
कदाचित् होश आने से पहले भी वह
गाती थी और
तुतलायी कभी नहीं दो वर्ष की आयु तक
की बहुत अधिक बातें याद थीं ।
और उससे
पहली की बङी घटनायें चित्र की तरह
।जब कभी बङों से ज़िक्र
किया तो अचंभा किया जल्दी वर्णमाला
लेने से सीधा कक्षा तीन में प्रवेश
मिला क्योंकि सारी किताबें तो याद
थीं छुप छुप के पढ़ना और सब
सहेलियों की पाठ्य पुस्तकें पढ़ जाना ।
पिताजी ने बैठने वाले पटरे पर
वर्णमाला लिखी और
बिना बारहखङी रटे याद हो गयी और
पहला काम मिला चिट्ठियाँ लिखने
का जो भी काम
होता किसी का भी तो आ जाते
कभी परिजन
तो कभी पङौसी तो कभी शुद्ध लेखन और
मैटर सार सुनकर ही विस्तार लिखने
की दैवीय प्रतिभा ने एक
अच्छा खासा डाकिया बना दिया था
स्कू
जाने से पहले माँ की पाती पापा के नाम
लिखना सबसे भावुक पल होते
पिताजी को चिट्ठी माँ खुद लिख
सकतीं थी खूब पढ़ी लिखीं थीं लेकिन
उसका लेख कुछ ऐसा था कि जब जमाकर
लिखती तो मोती से लगते और माँ का खत
बिना पूछे ही शुरू करना पङता जब
वो कहती लिखो तो एक दो बार
पूछा कि ऊपर क्या तो बताने की जगह
डाँट मिलती और अब हँसी आती है
कि पाँच सात साल
की बच्ची को क्या पता क्या लिखना!!
संबोधन? फिर पिताजी के पत्र देखकर
प्रिय --—--लिखा तो डाँट पङी तब
लिखा पूज्य बच्चों के बाबूजी और
सारा समाचार पत्र घर ही नहीँ मुहल्ले
का भी और सारी सूची क्या क्या लेते
आना अंत में आपकी वही -----औऱ पत्र
का जवाब पाते ही दें।
फिर ऊपर की पंक्तियाँ य़हाँ सब कुशल
मंगल है आशा है ***
--संवेदनायें चरम पर
होतीं माँ रो लेती और वह भी
ये पत्र सैकङों दिलों का हाल उसके मन
पर
छाप जाते और बोध बालक की बजाय मैं
प्लेटो अऱस्तू हो जाती।
कदाचित् चिट्ठियाँ ही उसका प्रथम
गद्य और फिर काव्य संकलन होतीं अगर
एकत्र हो पातीं
=====क्रमशः
©®¶©®¶
Sudha Raje
Mar 12

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