Friday, 10 January 2014

कहानी :-अतृप्त आत्मा भाग-4-

Sudha Raje wrote a new note:
Sudha
Raje17-7-2013//7:03pmअतृप्त
आत्मा ::कहानी खंड
चतुर्थ:अंतिमकङी :••••••इंस्पेक्टर काळे
का कहना थ...
Sudha Raje
17-7-2013//7:03pm
अतृप्त आत्मा ::कहानी खंड चतुर्थ:अंतिम
कङी :
••••••
इंस्पेक्टर काळे का कहना था भूत
हो सकता है नर्तकी हो ।
या राजपुरोहित
या छोटी रानी या कोई भी ।
किंतु मेरा मन नहीं मान रहा था।
आखिरी प्रयास के तौर पर मैंने स्थानीय
पुलिस द्वारा निकाली गयी कार देखने
का फ़ैसला किया।
उसमें गयंद के चारों भाई परिवार सहित
मृत पाये गये थे । दस व्यक्ति के बैठने
लायक वह एक मँहगी कार थी जिसे
खरीदना उन किसानों के बूते के बाहर
की चीज थी ।
मैं लौटना ही चाहता था कि मुझे कुछ
दिखा ।
वह एक माला थी ।
साधारण सी वस्तु जो डैशबोर्ड से फिसल
कर इग्नीशन में फँसी चाभी पर लटक
रही थी आधी टूटी माला । जिसके हर
गुरिये पर एक गाँठ लगी थी।
आधी कहाँ है??
मैंने बरामद सामान देखा और सारी कार
छानबीन करायी डैड बॉडीज पर
भी आधी माला नहीं थी।
कार बंद थी और कोई सामान नदी में
बहा नहीं था।
फिर आधी माला कहाँ गयी ।
लाल चंदन की वह माला मेरे दिमाग में
ठक ठक कर रही थी।
तभी काळे ने कहा ।
यार बनर्जी!!! मुझे लगता है मैंने
माला कहीं देखी है ।
कहाँ काळे याद करो ।
किसी के हाथ में ।
मैंने एक एक करके सबके नाम लिये जिनसे
हम दोनों पिछले सप्ताह मिले थे।
राजगुरु!!!!!!
काळे चीखा
व्हाट
???
हम लोगों ने कार फिर नगर की तरफ
घुमा दी ।
थोङी ही देर में हम दोनों राजगुरू
की टूटी फूटी आलीशान हवेली में थे।
वृद्ध व्यक्ति धवल श्वेत दाङी पगङी और
उत्तरीय पहने अपने भव्य व्यक्तित्व से
किसी का भी मन मोह ले ।
काळे ने पूछा
पंडितजी माला कहाँ है ।
राजगुरू मुसकराये । कौन
सी माला दरोगा जी?
ये?
उनके हाथ में हू ब हू वैसी ही एक और
माला थी जिस पर जाप लगातार
जारी था।
हमने उल्लुओं की तरह एक दूसरे को देखा।
पंडित जी ये खास चंदन है दुर्लभ
मलयगिरि चंदन
जो यहाँ किसी जोगी बिसाती पर
नहीं मिलता । आप बतायेंगे ये
माला किस
किस के पास हो सकती है?
ये मैं कैसे बता सकता हूँ? लेखक साहब?
वृद्ध के चेहरे पर परम शांति थी।
हम लोग लौटने लगे ।
तभी एक नौकर चाय पानी ले आया ।
मेरा ध्यान आधी माला पर था।
तभी काळे ने पूछा पंडित जी आप आनंद के
क्या लगते हैं??
पुत्र!!
व्हाट??
उनका तो """""""
नर्तकी रतनदेवी से प्रेम था!! यही न?
उस ज़माने में बाल विवाह होते थे ।
आनंद मेरे पिता थे । मेरी माँ से सात
वर्ष
की आयु में विवाह और बारह वर्ष
का गौना होकर सोलह वर्ष की आयु में
मेरा जन्म हुआ था ।
तभी माँ को पता चला पिताजी के
संबंधों का और बीस वर्ष की आयु में
उन्होंने विष खाकर प्राण त्याग दिये ।
मुझे दादी ने पाला।
मैं कभी पिताजी का प्रेम
नहीं पा सका ।
मैंने फिर विवाह ही नहीं किया ।
ये माला मुझे पिताजी ने काशी से मेरे
जन्म पर लाकर पहनायी थी । तब से
ही मेरे पास है।
मैंने देखा वृद्ध अशक्त है और ऐसे कांड
नहीं कर सकता।
हमने वापसी से पहले हवेली के शेष
पुजारियों से मिलने की ठानी ।
तीन से मिलकर निराश हो चुके
तो इंस्पेक्टर ने दुबारा डाक बंगले पर
आकर शेरसिंह से पीने खाने का इंतज़ाम
करने को कहा और हम
आखिरी व्यक्ति मंदिर के महंत से मिलने
चल पङे ।
महंत कोई पचास साल का प्रौढ़
गौरवर्ण हृष्टपुष्ट था । चाँदी से सफेद
बाल और बढ़ी हुयी दाङी पीले वस्त्र ।
जाने क्यों इसबार गौर से देखने पर मुझे
उसकी शक्ल राजगुरू की तरह ही लगी।
बस आयु में बीस साल का अंतर ।
हम लोगों ने मंदिर दर्शन करके कुछ
फोटो निकाले और पूछा कि
-""महंत साब आप यहाँ कब से हैं??
यही कोई तीस साल से ।
कैसे आये यहाँ?
गयंद जी ने हमें रोक लिया हम तो अनाथ
बाल ब्रह्मचारी थे बस यहाँ संगीत मेले
पर आ जाते थे साधुओं के साथ!
पहले कहाँ थे?
महोबा
वहाँ कहाँ से आये?
किसी साधु को पङे मिले थे जंगल में ।
जंगल!!!!!!
हाँ कोई वहीं एक देवी के चौरे पर छोङ
गया था।
अचानक काळे ने मेरा हाथ दबाया।
टूटी हुयी माला का आधा भाग नटराज
की प्रतिमा के चरणों में चढ़ा था ।
और महंत के हाथ में कोई
नयी माला थी आज । मुझे याद आया कुछ
और मैंने पुराने फोटो निकाले ।
महंत साब इन्हें पहचानते हैं?
हाँ
ये राजगुरू है ।
और इन्हें?
ये हमारे राजपुरोहित आनंद का चित्र है
महल का।
ये देखो दो मालायें इनके गले में हैं
हाँ
एक राजगुरू के पास है ।
तो?
दूसरी आप के पास थी?
नहीं तो
ये रही महंत साब आधी माला ।
अब????
काळे अरेस्ट हिम ।
जब हम लोग महंत साब को हवालात
भेजकर डाकबंगले लौटे सामान उठाने
तो मीडिया का हुजूम और गाँव के लोग
हमारे खिलाफ नारे लगा रहे थे।
थोङी देर में हमारे बयान के बाद
सन्नाटा छा गया।
महंत
दरअसल नर्तकी रतनदेवी और आनंद
का पुत्र था। जिसे जन्म के समय चंदन
माला पिता ने पहनायी थी ।
नर्तकी रात के अँधेरे में ज़ान बचाने
तालाब में कूदी तो तैरकर दूसरे छोर पर
जा पहुँची । वहाँ बच्चे को घाट पर रख
ही रही थी कि फिसल कर वापस
जा डूबी । कुछ चोरों ने बच्चे के जेवर
उतारे और जाकर जंगल में साधुओं के टोले
को आता देख बच्चा छोङकर जा छिपे।
बच्चा जब साधुओं ने
उठाया तो राजोचित
पोशाक़ देखकर पाल लिया और
महोबा दरबार में पुजारी को सौंप
दिया। चंदन माला और राजमुद्रा देख
कर
पुजारी सब समझ गये
नर्तकी का पता लगाया किंतु वह
नहीं मिली । तालाब से उसकी लाश
मिली ।
पुजारी ने जब अरिदमन के परिवार
की कथा जान ली तो मरते वक्त सब कुछ
महंत ज्ञानेंद्र को सुनाया। और
निशानियाँ सौंप दीं ।
माँ पिता के प्रतिशोध ने उसे उस धन
को और परिवार को तबाह करने
की जिद
दी और वह गयंद के नशे और जुये की लत
का फायदा उठाकर मंदिर में आ डटा।
वहाँ से सारा धन लगातार वह
निकालता और
अनाथालयों साधुकावासों और
नारी निकेतनों में बाँटता।
बलिष्ठ और युद्धकला में माहिर
ही नहीं वेश बदलने में निपुण ज्ञानेंद्र
नर्तकी का वेश रखकर
लोगों को डराता और जब डर जाते
तो मार देता।
जिसने भी देख लिया कुछ शक भरा वह
भी फाँसी से या धकेल कर मार देता।
किरायदार की बीबी प्रसाद में मिले
स्लो पॉयजन से मरी तो लङकों को खुद
घरवालों ने मरवा दिया जब महंत
को भूत
भगाने का उपाय करवाने बुलवाया।
वह आराम से बाहर आकर
कहता रखवाली करना द्वार पर और
रात में जाकर बेहोश
व्यक्ति को लटका देता ।
गाँव के घर एक मंजिला और लोग डरपोक
पोस्टमार्टम कौन कराता।
गयंद के भाई भी महंत को प्रेतमुक्ति के
लिये गये थे । जब गयंद का चुराया धन
हाथ लगा तब।
कार को महंत चला रहा था और मोङकर
कूद गया नदी में । किंतु माला द्वार बंद
करते टूट गयी
महंत राजगुरू का भाई है ।
©®सुधा राजे
Wednesday at 8:18pm
Jul 19, 2013

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