Monday, 20 January 2014

लेख :संस्मरण यात्रा वृतांत मेरठ

Sudha Raje
मेरठ एक संवेदनशील इलाका है । हम सब
अकसर परेशान हो जाते हैं जाम लगने पर
। वहाँ इतने दंगे हो चुके हैं कि हर पल हर
आदमी जो स्थानीय है डरा रहता है ।
जरा सी असावधानी और गले से चेन जेब से
बटुआ और बगल से बच्चा गायब ।
ऐसे में पुलिस और स्थानीय नेताओं
की लापरवाही का आलम ये है
कि मलियाना फाटक परतापुर बाई
पास बेगम ब्रिज हापुङ अड्डे सूरजकुण्ड
पर बङे अतिक्रमण हो चुके है ।
रेलवे लाईन के दोनों तरफ
घनी मंडी मलियाना फाटक के नीचे
लगी है और सारी गलियाँ चाहे अस्पताल
की हो या हवाई अड्डे के निर्माण
की तरफ या चौधरीचरण सिंह
यूनिवर्सिटी की तरफ सब पर
अतिक्रमण खड्डे और लापरवाही से
वाहन चलाते नये लङके
लङकियाँ टैक्सी ऑटो ।
स्टंटबाज लङके अकसर कॉलेज के आसपास
बाईक स्टंट करते मिल जाते है जबकि कई
बार ज्ञात हुआ कि वे पढ़ने वाले लङके
नहीं थे बल्कि गैराज ढाबे और जदह ब
जगह काम करने वाले लङके थे
जो बढ़िया कमाई करके शान दिखाने के
चक्कर में बढ़िया कपङे पहनकर
लङकियों की आवाजाही वाले मार्ग पर
स्टंट कर रहे थे ।
लगभग हर रोड पर बॉयज हॉस्टल
बनाकर लोगो ने मकान किराये पर
चढ़ा रखे हैं और तीन हजार से छह हजार
तक एक कमरे का किराया माँग रखा है ।
जिसकी वजह से एक कमरे में दो से छह तक
लङके लङकियाँ रहते है ।
मेरठ गाँवों का महानगर है वहाँ नगरीय
संस्कृति छू भी नहीं गयी ।
अनुशासन नाम की कोई चीज नहीं
और कानून व्यवस्था भगवान अल्लाह और
यीषु के हवाले है ।
जुमे की नमाज़ सङको पर पढ़ी जाती है
जबकि लोग चाहे तो घर पर सुकून से पढ़
सकते है ।
ठीक दिल्ली अड्डे से मवाना अड्डे पर
तक पशु काटे जाते है खुले आम रोड के
दोनों तरफ
मख्खियाँ भिनभिनाती रहती है और
काटकर बङे बङे टाँग सिर पसलियाँ पीठ
पेट ऊँचे काऊन्टर पर टाँग कर रखे जाते है
। खून सने हाथ लिये रुपये गिनते
दुकानदार और वहीं कटने के इंतिज़ार में
बँधे या खुले भटकते पशु
ना शीशा ना जाली ना ढक्कन ना बंद
शोकेस?? कलेक्टर रणदीप रिणवा तो आज
आये है । मेरठ के लोग कानून को ठेंगे पर
रखते हैं । ऑटो वाला सवारी भर लेता है
और अगर बाकी सवारियाँ बीच के
स्टॉपेज पर उतरती चली गयीं तब
तो बची हुयी इकली सवारी जिसको बि
मंजिल तक के लिये ऑटोवाला बीच रास्ते
में कहीं भी उतार देगा कि अब एक के
लिये इतना तेल नहीं फूँकता ।
लोग ठसाठस ठाँसकर सवारी भरे
बिना चलते ही नहीं आप कितने
ही ऑटो बदल लीजिये सोलह सवारी जब
तक नहीं भरेगी तो ऑटो नहीं चलेगा ।
लोग बिना सायलेंर के जनरेटर
आटाचक्की स्पेलर और तमाम
ध्वनिपैदा करने वाली मशीने चलाते
रहते है ।
बस में बूढी कमजोर और जवान
गर्भवती औरतें मासूम बच्चे गोद में टाँगे
नववधुयें और बेहद बीमार घायल लोग खङे
रहते है जवान हट्टे कट्टे स्थानीय लङके
उद्दंडता से सीट पर पसरे रहते हैं ।
मकानमालिक किराया एडवांस लेता है
लेकिन मोटर चलाने पर बिजली पर
आवाजाही पर और ताला लगाकर
जानेपर बङबङ करता है ।
साफ सफाई का ये आलम है कि हर
डिवाईडर के बीच
का हरितपट्टी क्षेत्र कूङा कचरा फेंकने
का स्थान बना हुआ है । वहीं सिंदूर
पोतकर तमाम भिखारी तांत्रिक
मांत्रिक बैठे हैं तो तमाम टेंट लगाकर
मरदानगी की दवा बेचने वाले
शरतिया भूत प्रेत वशीकरण
की गारंटी की दुकाने हैं । सङक पर हर
तरफ अफरा तफरी है
कहीं दिखता नहीं कि पुलिस है नियम है
कानून है । पैदल चलने वाले को ठोक
देना परम कर्त्तव्य है और जोर जोर से
हॉर्न वगातार बजाते रहना अनिवार्य
आदत ।
लोग जमकर गुटखा खाते हैं और
कहीं भी जाईये अस्पताल रेलवे स्टेशन
मंदिर पार्क कॉलेज सब जगह गुटखा पान
थूकते दीवारों पर सभ्य नागरिक मिल
जायेगे । हर मंदिर की पिछली दीवार
पर काली लाल पीली इबारतों में
लङकियों के लिये प्रेम संदेश पास होने
नौकरी लगने और ब्याह होने की मन्नते
लिखी मिल जायेगी । शोर शोर शोर
कहीं तकरीर कहीं मीलाद कहीं बारात
कहीं मातम कहीं नेता का प्रचार और
कहीं हुङदंग डांस पार्टी । कूङे के ढेर के
ढेर शहर के हर इलाके में । खाली प्लॉट
टूटे मकान और रोड डिवाईडर मतलब
कूङा पहाङ । गंदे भरे पङे गटर और उनके
टूटे ढक्कन टूटी नाली से सङक पर
बहता पानी । और सङकों पर खड्डे
ही खड्डे । हर तरफ झगङा करते लोग ।
जाम लगने की वजह से दाम कम कराने
की वजह से बस ऑटो में सीट पर ठीक
पसर कर बैठने की वजह से ।
खङी सवारियाँ पास पास खिसकाकर
सटाकर जगह बचाकर और
सवारियाँ भरने की वजह से
झगङा झगङा झगङा । लङकियाँ को सीने
पर नोंच लेना पीठ पेट कूल्हे पर
गंदी भावना से कोंचना । और
घूरना फिकरे कसना । मामूली बात है ।
कई बार तो शराब पीकर पुलिस वाले
तक लङकियों को देखकर बस में बैठे आपस में
असहनीय वार्तालाप करते मिल जायेंगे
। पॉश कॉलोनियाँ छोङ दें तो हर तरफ
शोर गंदगी और धक्कामुक्की । मेरठ में
लोग कपङे तो आधुनिक पहनते है किंतु
सोच!!!! मजहबवादी धर्मवादी और
स्त्रीविरोधी । बाहरी गाँवों से आये
लङके लङकियों के तो मेरठ आते ही जैसे पंख
लग जाते है । गाँव में दुपट्टा डाले
फिरती लङकियाँ और कुरते पाजामे वाले
लङके मेरठ में बॉलीवुडिया पोशाकों में
कैंपस को फिल्मिस्तान बनाकर ग्रुप में
हुल्लङ मचाते मिल जायेंगे । माँ बाप
की कमाई पर ऐश और बचे समय में
फटकेबाजी । जो हकीकत में पढ़नेवाले है
वे थोङे ही समय में मेरठ से भाग खङे होते
हैं । कॉलेज तो बहुत है लेकिन पढ़ाई कम
ही कॉलेजों में होती है ।
गुणवत्ता वाली पढ़ाई तो और भी कम
कॉलेजो में होती है । नकल कराने वाले
मास्टरों की चाँदी है लङके
लङकियाँ पढ़ना नहीं डिगरी कबाङना च
है । अजीब हाल है लोग
बाहरी आदमी को चटपट बेवकूफ बनाने से
जरा भी नहीं हिचकते । दाम
ज्यादा लेना पता गलत बताना फटे नोट
थमाना लूटपाट कर लेना और छल से लाभ
लेना । फटाफट हर बात को तो हिंदू
मुसलमानी चश्में से देखने की आदत है ।
ढींगे हाँकते कदम कदम पर लल्लनवपप्पन
मुन्ने दादा । जो भी मेऱठ में दस साल
हरकर खुशी से जी लिया वह फिर
कहीं भी कैसे भी रह लेगा
मेरठ में कुछ साल के अनुभव
©®सुधा राजे
Jan 16 at 7:46am

No comments:

Post a Comment