Friday, 17 January 2014

अकविता:बारूद केआदमी4

Sudha Raje
सैनिक रोड पर जा रहा है। या ट्रेन में
या बस में । निःसंदेह ड्यूटी से आ रहा है
या ड्यूटी पर जा रहा है । हर सैनिक
सुबह पाँच बजे परेड ग्राऊण्ड पर
पहुँचता है दस किलोमीटर दौङता है
तीन घंटे रोज शस्त्राभ्यास करता है ।
ठीक घङी देखकर खाना खाता है
घङी देखकर सोता जागता है ।
एक प्रोफेसर की तनख्वाह सैनिक से
अधिक है ।
एक बैंक क्लर्क की तनख्वाह सैनिक से
अधिक है ।
एक मान्यताप्राप्त पत्रकार
की तनख्वाह भी सैनिक से अधिक है ।
एक बैंक अधिकारी जज वकील पत्रकार
टीचर ऐसे कपङे पहनता है जो देह
को आराम देते है ।
एक सैनिक के जूते पहनकर वरदी पहनकर
जितना असलहा बदन पर होता है
उतना टाँग कर केवल सात दिन बिताकर
देखो ।
रोज मुँह अँधेरे सरदी गरमी बरसात रेत
बरफ पहाङ दलदल सब के साथ हर हाल में
सुबह तङके बारहों महीने सातों दिन हर
रोज उठकर देखो ।
ड्रिल परेड पेट के बल
घिसटना कोहनी के बल चलना एक हाथ
एक पाँव बाँधकर चलना कुत्तों और
घोङो के पीछे दौङना ।
फिर ये तो रोज का वार्म अप है ।
मुस्तैद ड्यूटी ।
बाढ़ भूकंप दंगा युद्ध छद्म युद्ध
आँधी तूफान में हवा में पानी के भीतर
जमीन पर जमीन के भीतर पैराशूट पर
रस्सियों पर हर वक्त ज़ान की बाजी ।
जाने कब चूकते ही प्लेनक्रेश
पैराशूट नहीं खुला जान गयी ।
रस्सी टूटी जान गयी ।
जंगल में साँप जानवर सीमा पर दुश्मन
घर के भीतर दंगाई सब से जूझना ।
हर जगह हर तरह
ये सब करने के बाद
लौटकर घर जाता सैनिक सम्मान
का हकदार है ।
हमारा नौकर नहीं पहरेदार है ।
एक विधायक को रास्ता मत दो भले
मगर सैनिक को जरूर दो ©®सुधा राजे
Yesterday at 10:09am

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