Thursday, 2 January 2014

नज्म :चली आयी मेरी ही याद (पुल्लिंग)

Sudha Raje
चली आयी मेरी ही याद
मुझको इक़ तराने से
मैं अपने आप से
मिलता गया दिल टूट
ज़ाने से
न पूछो किस तरह
ग़ुज़री कहाँ गुजरी कहाँ था मैं
चला हूँ उम्र भर
निकला नहीँ उसके
ठिकाने से
नशा भी एक रहमत
था अगर
वो दर्द में देता
दिया मुझको अँधेरों में
रखा
वहशत छुपाने से
ये रोज़ो शब अँधेरे औऱ्
उजाले रोज़ अफ़ज़ूं ग़म daily
growing
न ज़ाने ज़ी गयी कैसे
रियाज़त faithजख़्म खाने से
जरीं मौका golden
chanceजो खोया ज़िंदग़ी भर
फिर नहीँ लौटा
जिंदानीं शौक़ औ उल्फ़त
दिल
जिंदा दर ग़ोर ख़ाने
से
चले गये साख्तः रिश्ते दफ़न
करके न फिर देखे
मैं साक़िन बे शहर सामां
कहूँ किस आस्ताने से
सुनायी रौनकें
पुरखों की ज़ीदारी नियाज़ी यूँ
छिपाये गये हम अपनी ग़ुरबतें ऐसे ज़माने
से
तुझे पहचान तो लेता चला आया मैं
महफ़िल से
तुझे
शर्मिन्दग़ी ना हो मेरा रिश्ता बताने
से
कलेज़ा काट के
जिनको खिलाते गये
वही अपने
मुझे इकरोज
तश्ना बेअमां कर गये सयाने
से
वो बच्चा जो अकेला सो नहीं सकता था
हकीक़त में
मरा इतना नहीँ डरता डराने
से
मैं टूटा इस कदर
बिखरा समेटा बारहा फिर
भी
न रोके रोक पाया ख़ुद
को
उससे दिल लगाने से
सुधा "ये ग़म मुहब्बत का है
या फिर दोस्ती हस्ती
ये किस्सा बेबसी सरशक़
ज़हाँदारी फ़साने से
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Sudha Raje
Dta//Bjnr
Mar 20, 2013

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