Tuesday, 28 January 2014

अकविता:जब पहाङ नहीं बोले

जब पहाङ को बोलना था पहाङ नहीं बोले तो टूट कर गिर पङी नदी ।
जब मैदान को बोलना था मैदान नहीं बोले तो टूट टूट कर गिर पङे पेड़ ।
जब बस्ती को बोलना था बस्ती नहीं बोली तो
नोंच नोंच कर काटी गयीं लङकियाँ बच्चे कमजोर ।
जब कलम को बोलना था तब कलम नहीं बोली
कोंच कोंच कर लिखा गया लहू से झूठ
जब तुम्हें बोलना था तुम नहीं बोले
इसलिये फूट फूट कर रोया दर्द
बोलने लगेंगे जिस दिन पहाङ सच
नदी नाचती रहेगी ग्लेशियर से सागर तक
जब
बोलने लगेगे सच मैदान
जंगल हरे हो जायेगे पहाङों से मरूस्थल तक
जब
सच बोलने लगेगीं बस्तियाँ
लङकियाँ बच्चे और कमजोर गली में नाचेगे देर रात तक रोज
जब कलम सच बोलेगी
लहू के धब्बों के नीचे से निकलेगा इतिहास और गवाही देगा ।
जब
तुम सच बोलोगे
दर्द कंठ में दिल में फूट फूटकर नहीं गीतों में हहर हहर कर बहेगा ।
मूक आँसू अगर बोलते हैं तो पढ़ लेना एक चिङिया कटे पेड़ पर उदास गा रही है ।
©®सुधा राजे

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