Saturday, 11 January 2014

नज़्म :-भीतर दहका दावानल

Sudha Raje
भीतर दहका दावानल है
ऊपर हराभरा जंगल
दिलवाला जो भी देखा बस
जलते देखा
तू भी जल
प्यास एक ही प्यास पालने
से मरघट तक धधक रही
प्यार इश्क़ दीवानापन
क्यों करता पगले खुद से छल
हर रिश्ते में
वही पूर्णता
खोज
रहीं छलकीं आँखें
टूटा दिल टूटे सपने ले
टूटी हिम्मत अब तो चल
दैरो-हरम दुनियाँ के मसले
मखलूक़ाती फिक्रो-हुनर
दर्द वही आवाज़ है दिल
की
लोग न बदले तु ही बदल
चैन से
तेरी नहीँ बनेगी फ़ितरत
शायर वाली है
ऊपर ऊपर हँसती
दुनियाँ कहती रोज़ मिलेंगे
कल
लब पर आते आते बेबस रह
जाते शिक़वे किस्से
,अंदाज़े सब ग़लत लगाते
सच रह जाता होंठ कुचल
कौन तबाबत
करता तेरी रोज
कलेज़ा नोचे है
ख़ुद ग़नीम के लश्कर में तू
दोस्त कहाँ से करें पहल
जो तेरे दिल में बसता है
उसको पाना नामुमकिन
जो तेरी हसरत में जलता
रहता रोज हथेली मल
बङी खुशी के इंतिज़ार
में
सारी सिन यूँ बीत गयी
कितनी ही मुस्काने
छोङी
नादानी में सुंदर पल
प्यासा जन्मा और
जियेगा तङप तङप कर
भूखा ही
प्यास तेरी किस्मत है
पपीहे
स्वाति जलद क्यों माँगे
फल
रोज चाँद को देख
चकोरा आँखें भर भर
चीखेगा
तनहाई का राही कैसे चाँद
मिलेगा लाख मचल
काली दुनियाँ के कुरते पर
छींटे रंगबिरंगी हैं
रंग दूधिये में कुछ काला
समझ तो ले पर चुप्प टहल
कारिस्तानी जिन जिन
की है नहरें बाँध बनाने की
जान लिया चुपचाप भरे
जा रौशन
करया villageखङी फसल
बर्क़ चमकती सीने में
जो कैसे लिखें कहाँ गायेँ
कुरबानी की ईद के रिश्ते
काट के
अज़्हा दिल और ढल
घबरा के मरने वाले
भी पीछे क्या छोङ गये
मंज़िल पर तनहा रूहें हैं
मौत ज़िंदगी सफ़र निकल
सुधा हमारे हाथ में रख
कर
सभी फ़ैसले दर्द कहे
या तो जी ले
अपनी खुशिया
या फिर मेरी आग दहल
सुधा राजे
Joyrney by train
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SudhaRaje
Dta/Bjnr
Mar 15, 2013

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