Friday, 10 January 2014

कहानी :-अतृप्त आत्मा भाग -3

Sudha Raje wrote a new note:
16-7-2013//5:35Pmअतृप्त
आत्मा ::कहानी ::*तृतीय खंड ।।°°°°°°
°°°°°°°°°°°°°°°°जब मैं डाक बंगले पर
लौटा...
16-7-2013//5:35Pm
अतृप्त आत्मा ::कहानी ::*तृतीय खंड ।।
°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°
जब मैं डाक बंगले पर लौटा तो दिमाग में
छोटी रानी राजपुरोहित आनंद
राजा रिपुदमन और राजनर्तकी रतन
की प्रेम कथा त्रासदी और
बेबसी की कथा किसी चलचित्र सी दौङ
रही थी ।
मैंने इंस्पेक्टर काळे से
पूछा -""क्या कहती है पुलिसिया नाक?
यहाँ लगभग पचास मौतें हुयीं हैं । एक
दो को छोङकर ज्यादातर आत्महत्यायें
रहीं । क्या लगता है यहाँ? प्रेतात्मायें
या कोई गिरोह? ""
यार बनर्जी!!! मेरी भी खोपङी घूम
रही है ।
काळे ने पैग बनाया और बर्फ डालकर मुझे
थमाया ।
ओहो तुमने फिर इतना सारा सोडा कर
दिया!!!
बंगाली का पीना और कलकत्ते
का ज़ीना सबके बस की बात
नहीं इंस्पेक्टर!!
मैंने वाईन का मिक्सचर ठीक किया ।
देर रात तक कहानी का दूसरा भाग
लिखकर जब मैं निशाचर वृत्ति वश बाहर
बरामदे में आया शेरसिंह
बीङी पी रहा था । मैंने सिगरेट
जलायी और वहीं अलाव के पास
कुरसी पर बैठ गया ।
शेरसिंह!! यहाँ कस्बे में बाहरी लोग
भी आते जाते हैं?
नहीं बाबू!
कभी किसी का दूर दराज़ का रिश्तेदार
आ जाये तो जल्दी ही पहचान में
बोली की वज़ह से आ जाता है । जबसे
रैम्जे भाई का स्कूल बंद हुआ कोई
नहीं आता । लेकिन हाँ पुरातत्व वाले
और कोई कोई शौकिया फोटोग्राफर
जरूर आ जाते हैं ।
मेरी उत्सुकता बढ़ी ।
वे लोग रुकते कहाँ हैं?
यहीं साब और क्या रखा यहाँ ।
उनके कुछ नाम पते?
ठहरिये साब मैं रजिस्टर लाता हूँ।
पाँच मिनट में लगभग ग्यारह बजे मैं
डाकबंगले की सूची पढ़ रहा था । मैंने कुछ
नाम पते नोट किये और ट्रांसमीटर से
कुछ दूर दराज के साथियों को संदेश
दिया उन पतों की हक़ीकत निकालने
का ।
सुबह हम लोग नौ बजे तक शेष मालिकों से
मिल चुके थे ।जो सब पुजारी कुटुंब से
ही थे ।
और बाकी कहानी जो पता चली वह एक
करुण कहानी थी।
छोटी रानी को न तो राजा अरिदमन
का प्यार मिला न राजपुरोहित आनंद
का । बङी के विवाह के पाँच साल बाद
मँझली आयीं थीं और दस साल बाद
छोटी । इसलिये सारा महल
बङी रानी का वफादार था । महल
को चार लंबी दालाने चारों कोने पर
बने दस दस कमरों के पृथक भवनों से
जोङती थी वरना सब खंड अलग ही थे ।
तीन कोने तीन रानियों के । नैऋत्य में
बने भवन में राजा पुरूष
कर्मचारियों सहित रहते जो अंदर
नहीं जाते । कुछ किन्नर और
दासियाँ ही अंदर आतीं जातीं थीं।
किन्नर बाहर आ जाते थे ।
दासियाँ सिर्फ रानियों के साथ
ही बाहर आतीं।
इन्ही में एक किन्नर सुंदर बलिष्ठ
भरती हुआ "नवल बाई"। जिसका प्रभाव
हवेली पर पङने लगा था कि सुबह रोज
संगीत की कक्षा चलने लगी थी और
छोटी रानी को संगीत सीखने का शौक़
लग गया ।
राजा का रतनदेवी पर प्रेम
बढ़ता गया । जो नहीं होना था वह
चमत्कार हो गया ।
रतनदेवी गर्भवती हो गयी । विवाह के
बीस साल बाद!!! संतान!!
वो भी राजनर्तकी के गर्भ में ।
राजा को नर्तकी के चरित्र पर संदेह
हुआ। जासूसी की गयी जो व्यर्थ रही।
राजा चिंता में जिस संतान को तरसते
उम्र गुजर गयी वह
मिली भी तो किसकी कोख से!!!
ना स्वीकारते बनता ना ही दुत्कारते ।
अंत में गुप्त रूप से एक बुजुर्ग पुरोहित
को बुलवाया गया कहने लगा कि ये पुत्र
है । और जन्म ले लिया तो सम्राट
हो जायेगा । किंतु इस पर कालसर्प
योग है जो मृत्यु योग बना रहा है।
छोटी रानी को जैसे ही पुत्र के आने
का पता चला उसने तालाब के पार नवल
किन्नर को बुलवा लिया । पाँच साल के
वियोग ने उसको निष्ठुर और को व्याकुल
बना दिया था ।नवल ने रानी से
कहा कि राजा केवल पुत्र पैदा होने तक
नर्तकी को महल में रखेंगे और वह
आपका पुत्र कहलायेगा ।
। रानी ज़िद मान
बैठी नर्तकी को हटाने की हठ ठान
ली । नवल केवल ज्ञानी का कर्त्तव्य
उठा रहा था।
रानी के आदेश पर नवल को गिरफ्तार
कर लिया गया ।
ज़ुर्म राजमहिषी के खजाने पर बुरी नज़र

नवल असफल प्रेम के इस प्रतिशोध पर
ठठाकर हँसा।
कैदखाने में पङी नवलबाई । राजभवन में
आने से निषिद्ध रतनदेवी ।
सत्ता जाने की चिंता में बङी रानी और
वियोग में जलती छोटी रानी।
राजा की हठ पर
नयी हवेली की तामीर शुरू
हुयी जहाँ रहना था अब
तीनों रानियों को । और "अरिदमन
विलास
"में रतन देवी रहने लगी एक खंड में ।
नर्तकी महल में आ गयी । बङी रानी दूर
राजधानी चलीं गयीं मँझली रानी के
साथ वहीं अपने लिये मुकर्रर भवन में
दत्तक पुत्र गयंद को ले गयीं ।
छोटी रानी!!
जिसे अभी तक
पता ही नहीं था कि राजपुरोहित आनंद
उसे प्रेम करते हैं या नहीं ।
वह सिर्फ बंजर जमीन सी जलती रहती।
राजा कभी कभार उसके रूप यौवन पर
तरस खाकर आ जाते और एक लंबे अरसे
को फिर रतनदेवी की ओढ़नी में
जा छिपते।
सारे महल में रतनदेवी के चित्र सजने लगे
। राजा महान कलाकार थे रतन
देवी अब सिर्फ राजा के लिये
नाचती अंतःपुर में । ठीक समय पर पुत्र
का जन्म हुआ । कैदी रिहा किये गये
नवलबाई को सेवा के लिये रतनदेवी ने
माँग लिया।
राजा उत्सव में मगन थे। काशी को खबर
भेजी पता चला आनंद वहाँ से भाग गया ।
कहाँ? वृद्ध दादा ने खोज करायी।
पता नहीं चला । रमल
लगाया जो कहता आनंद यहीं है
कहीं नहीं गया ।
एक रात
राजा छोटी रानी के महल में थे। वहाँ से
जब अचानक आधी रात को पुत्र को देखने
की इच्छा हुयी तो रतन देवी के कक्ष में
आ गये दबे पाँव कि नींद न खुले माँ बेटे
की ।
लेकिन ये क्या!!!!
ये नवलबाई का स्त्रीवेश तो नीचे
कालीन पर पङा है । और एक पुरूष
रतनदेवी के साथ सो रहा है लिपटकर
दोनों निर्वस्त्र!!!
राजा ने तलवार निकाली औऱ
दोनों का सिर धङ से अलग करने चल पङे
। तभी पुरूष की नींद खुली ।
ओहह ये तो राजपुरोहित आनंद है ।
इतना बङा धोखा।
दोनों ने पैर पकङ लिये ।
ब्राह्मण की हत्या मत करो राजा ।
हम राज्य छोङकर चले जायेंगे ।
रतनदेवी चीखी।
दोनों ने अपने वही वस्त्र लपेटे चाँदी के
पालने से रेशम पर सोते पुत्र
को उठाया।
ठहरो!!!
ये तो मेरी संतान है । ये
कहीं नहीं जायेगा।
अब नर्तकी हँसी ।
"राजा आप नहीं जानते हम
दोनों ही कैशोर्य के प्रेमी । किंतु
देवदासी ब्राह्मण से से विवाह नहीं कर
सकती थी। न ही कोई इस सच
को जानकर आनंद को नगर में रहने देता न
मुझे मंदिर में । राजगुरू
को तो नर्तकी की छाया से भी पाप
लगता है।
तब तक आप हम पर रीझ गये ।
हमने लाख वास्ता दिया आप नहीं माने
मनमानी की ।
राजभय ने हमें विवश किया कि आप ही से
विवाह करलें ताकि हमारा पुत्र
राजकुमार कहलाये "भांङ" नहीं । किंतु
बीच में छोटी रानी बेला जाने कहाँ से आ
गयीं आनंद पर मर मिटीं । और आपने दंड
हेतु उन्हें काशी भेज दिया।
वहाँ से मैंने उसे नवलबाई के रूप में
बुलवा लिया संगीत मंडली में ।आनंद मेरे
लिये आया है ये छोटी रानी तो मात्र
खिलौना है ।
आपने छोटी रानी ने हमें अलग कर
दिया और विवश भी ।
राजा आप किसी से झूठ बोलो स्त्री से
क्या बोलोगे?। आपका मान सम्मान
आतंक रुतबा कितना ही महान हो भय से
रानी चुप रह सकती है नर्तकी नहीं ।
आप एक पुरूष वेश्या से ज्यादा कुछ नहीं ।
मात्र वासना के खिलौने । न स्त्री से
प्रेम किया न संतान दी। पौरूष के कई
अर्थ होते हैं राजा सिर्फ स्त्री पर
पाशविक विजय मात्र नहीं । हृदय
भी जीतना पङता है । मेरा रोम रोम
आनंद का है । हम कोई सती और
पतिव्रती नहीं नर्तकी हैं । जो एक
की हो तो भी लांछित अनेक
की हो तो भी कलंकिनी।
जब आपने लोकभय से विवाह की रस्म
नहीं की । पुत्र चाहा ताकि आप
छोटी रानी का बेटा कहकर वारिस
भी पा जायें और बदनामी भी न हो ।
मैंने सोचा था तब तक रानी बनी रहूँ ।
किंतु नर्तकी तो हूँ कोई
राजकुमारी नहीं ।न तो धन बिना रह
सकती हूँ न आनंद के बिना ।
आनंद पश्चाताप से भर उठा था । उसने
तलवार उठाकर कहा मैं
आपको ब्रह्महत्या से मुक्त करता हूँ और
तलवार पेट में पूरी ताकत से भौंक ली।
पीछे छोटी रानी राजा को वापस ले
जाने आय़ी थी उसने वहीं से आनंद की बातें
सुनी जब नीचे गिरते
देखा तो ग्लानि वश झरोखे की तरफ
भागी और सबसे ऊँची छत से छलाँग
लगा दी ।
नर्तकी पुत्र को लिये खङी थी भाग
खङी हुयी । राजा ने महल से बाहर
पहरेदारों को जिंदा या मुरदा
गिरफ्तार करने का आदेश दिया । वह
कोई बचाव न देखकर । तालाब में कूद
गयी बच्चा गले में बाँधकर।
चीखती हुयी
""राजा मैं पुत्र सहित डूब रही हूँ ।
जो भी अब इस महल में रहेगा या इस
दौलत को ले जायेगा मेरी ही तरह
विवश खुद अपनी मौत मरेगा ।""
राजा लुटे पिटे हृदय के साथ सुबह सबके
सामने कहानी बना रहे थे कि नकाबपोश
शत्रु के आक्रमण और नवलबाई
की बहादुरी की। जिसे वापस स्त्रीवेश
पहनाकर जला दिया गया था।
महल पर"" नव ''जोङ दिया गया ।
"""नवरतन महल """
बङी मँझली रानी गयंद को लेकर आ
गयीं ।
एक रात मँझली रानी के महल से नशे में
राजा छत से गिरे और मर गये।
मँझली सती हो गयी ।
बङी रानी ने गयंद को सत्ता सौंपकर
वैराग ले लिया । और गंगा में एक दिन
तीर्थस्नान में बह गयीं।
गयंद अफीम के नशे में बिगङता गया । और
महाजनों साहूकारों दरबारियों के
हाथों लुटने लगा।
रतनदेवी को जो धन राजा ने
दिया जिस दिन सब बिक गया गयंद
की पत्नी ने क्लेश में शंखिया पीसकर
खा लिया औऱ मर गयी।
तीन बेटियों और एक पुत्र को गयंद के
ससुर लिवा ले गये जो साथ में
बचा कीमती सामान भी ले गये थे
लङकियों की आम परिवारों में शादी कर
दी । लङके को साँप ने डँस लिया।
एक दिन गयंद नशे में जुऐ में सबकुछ हार
गया तो हवेली पुजारी को बेचकर अपने
औरस पिता के गाँव जा बसा। वहाँ से
भी भाईयों से धन लेकर कहीं चला गया ।
तब से कोई नहीं जानता । वह कहाँ है।
हवेली तबसे लगातार किसी न
किसी की मौत से बदनाम
होती गयी बिकती गयी।
सुना है गयंद कहीं ज्यादा अफीम खाकर
मर गया ।
मुझे अलग अलग नगरों के खास तीन
आदमियों का पता चला जो कई बार
फोटोग्राफी और पुरातत्व के नाम पर
आये थे ।
गयंद की तीनों बेटियों के पति ।
जो उन लङकियों के मुँह से बचपन कैशोर्य
के वैभव की कहानियाँ सुनकर खजाने
की तलाश में आये थे । क्योंकि न तो गयंद
में राजपरिवार का खून था न
ही हवेली पर कानूनन हक़।
मैंने केस के सारे पहलू देखे मुझे कहीं से कोई
लॉजिक नहीं समझ में आ रहा था ।
आत्महत्याओं का।
अगले दिन मैंने फाईनल रिपोर्ट
लगा दी कि महज इत्तेफाक है
जो किसी की मौत का तार हवेली से
जोङ दिया गया ।
शाम का अखबार
महाराणा प्रताप नगर के अपने फ्लैट में
पढ़ रहा था कि चौंक पङा ।
मैंने काळे को तुरंत फोन लगाया ।
तुमने ईवनिंग न्यूज देखी?
हाँ यार ये कैसे संभव है?
एक व्यक्ति कार लेकर परिवार सहित
शो रूम से आ रहा था और अचानक कार
मोङकर खुद ही कार सहित पुल
की रेलिंग तोङते हुये नदी में कार
डुबो कर सुसाईड कर
दिया सपरिवार!!!!!
वो गयंद का भाई और परिवार थे
जरूर कुछ मोटा माल लाये होंगे ।
शेष फिर
©®सुधा राजे
Jul 16, 2013

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