Thursday, 30 January 2014

लेख :नक्सलवाद घरेलू समस्या नहीं रहा

Sudha Raje
छत्तीसगढ़ पहले मध्यप्रदेश ही था और
हमारा दूसरा घर भी जहाँ आज भी आधे से
ज्यादा परिजव रहते हैं ।और ये
जो बचपन
के ज़ज्बाती लोग होते है वो तो जैसे
जुगाली ही करते है बेध्यानी में
या ध्यान
में रखी हर बात का ।
ये जो हाय तौबा है न
दरअसल
इसी नीति की देन है ""फूट डालो राज्य
करो""
वनवासी सिर्फ जरूरत
की भाषा जानता है । वह जहाँ भूख
लगी खा लिया । जो मिला पी लिया ।
जहाँ नींद लगी सो गये । जो भाया उसके
हो गये । वन के विविध
देवी देवता अंधविश्वास भूत प्रेत
आत्माये
भी उतनी ही सजीव सदस्य है उनके
जीवन
की जितना कोई पालतू पशु ।
ये तो कोई कम पढ़ा लिखा किसान
मजदूर
भी कह देगा कि अधिकांश नेता -"भ्रष्ट
हैं
और महाभ्रष्ट होते जा रहे है"
पूँजीपति
को चाहिये कच्चा माल । वो है बिहार
छत्तीस गढ़ और मध्यप्रदेश में ।
सही कहें तो बँटवारा ही ग़लत हुआ
झारखंड और छत्तीसगढ़ का ।
इसको नागरिक हित के लिये
नहीं बाँटा गया । ये तीन
राज्यों की हुकूमत में फँसै कीमती खनिज
क्षेत्र को एक यूनिट बनाकर एक
ही प्रशासन के लिये बाँटा गया ।जिंदल
वेदान्ता और तमाम देशी बहुराष्ट्रीय
कंपनियाँ । पूरे वन खनिज और
संपदा का दोहन करती हैं । वहाँ जैसे
खोदकर सारा जंगल उलट पलट कर रख
दिया ।
वनविभाग
के सरकारी बंगलों में तेंदू पत्ता गोंद
वनफल वनघास और सूखे पेङ जब डिपो पर
जमा होते तो ये ""पास सिस्टम
""का शिकार होते । कि वन में
पत्ती लकङी और घास के
निजी अव्यवसायिक उपयोग को जा सकें

वन रक्षकों से दोस्ती भी रहती और
दुश्मनी । लेकिन उग्र कभी नहीं रहे ।
हाँलांकि निजी तौर पर कुछ
रिश्वतखोर
वन
अधिकारी वनवासी को ज्यादा पसंद
रहे । क्योंकि वे वनअपराध और वन
विधि संहिता से मुक्त रखते थे ।
कुल्हाङी छीनी औऱ साईकिल
जो किसी किसी पर थी बाद में छोङ
दिया ।
लेकिन जब उद्योग
पतियों का मायाजाल
फैला तो हर तरफ बाहरी लोग फैल गये ।
ये साहब लोग अंग्रेजी बोलते औऱ
वनवासी को हिकारत से देखते । कुछ
कामपशु भी थे । देखते देखते सारा जंगल
वनवासी के लिये वर्जित
इलाका हो गया ।
वह नहीं समझता था देश सरकार
संविधान और कानून ।
और वन में अपना राज समझता था ।
शातिर तस्करों ने पैसे का लालच
दिया और जानवर पेङ
जङीबूटियाँ काटी जाने लगीं । पकङे
जाते
वनवासी जेल जाते वनवासी औऱते
मर्दों की तरह दिन रात काम करती है
सो वे भी अपराध में शरीक़ हो गयीं ।
साहबों के घर लङकियाँ साफ सफाई के
काम पर जातीं और रहन सहन के सपने
आँखों में भर लातीं । जब तक
साहबों को नहीं देखा खपरैल
का कच्चा घर ताज महल से कम
नहीं था ।
लेकिन मानव स्वभाव की हवस बढ़
गयी रेडियो मोबाईल टी वी और छोटे
मोटे यंत्र सपने की मंज़िल हो गये ।
पैसा?? दिहाङी मजदूर को रोज
का रोज
खतम । जंगल में अघोषित अवैध रिश्ते
भी पनपे और वनवासी रस्में घायल होने
का आक्रोश भी । जहाँ तक हमें याद है
हमारे बेहद करीबी रिश्तेदार
को मरणासन्न एक ऐसे ही प्रेम प्रकरण
में
करके छोङ गये थे वनवासी । पूँजीपति -
साहब लोग-वनविभाग-के लालच रिश्वत
खोरी चरित्रहीनता ने असंतोष से
जख्मी कर दिया जंगली सीधे
भौतिकवादी जीवन को ।
राजनीति का लाल विचारक तंत्र इस
जख्म पर नमक मलने लगा और
विदेशी माओइस्ट ताकतों ने
देशी लालविचारकों को हुकूमत
का सपना दिखाया । लाल विचारक
नेता मजदूर वनवासी मुखियों के बीच
रूपया और झूठा मान सम्मान पूँजीवाद के
खात्मे का सपना लेकर पहुँच गये ।
वनवासी का दर्द मोङकर बंदूक
बना दी । जिनके दमन के लिये
पूँजीपति के उद्योग की सुरक्षा के नाम
पर सरकारी गोली चली । कानून
संविधान देश के प्रति लालविचारको के
जहरीले बाग़ी अविश्वास से
भरा जंगली खाकी और वरदी को लाल
करने लगा । ये
वरदी की दुश्मनी संगठित
धरपकङ में बदली एनकाउंटर हुये और
दोनो तरफ से लाशें गिरने लगी ।
लालविचारक महानगरों के
एसी कमरों से
मानवाधिकार पर लिखने लगे वरदी पर
सुबूत का दबाब बढ़ गया । रिमांड
पूछताछ में चीखें उठीं तो लालविचारक
नमक पर मिरची लेकर पहुँचे और बंदूके
बारूद विदेशी विश्व लाल वादियों के
सहयोग से जंगल में उगने लगीं ।
नक्सलवादी एक थर्राता नाम
हो गया जिस रूतबे को पाने
की इच्छा हर दबे दिमाग में भरने
को लाल कलम तबाही मचाने के तरीके
सैनिक प्रशिक्षण देने लगी । अब
वनवासी का एक और शोषक
हो गया नक्सलवादी समूह ये
हफ्ता वसूलते
मुफत का राशन खाते और ऐश के लिये औरतें
भी जोङा बनाकर ले जाते । ये औरते बंदूक
चलाती और बच्चो के साथ सूचनायें
लाती कुनबा बनाकर रहने लगे
नक्सलवादी परंपरा हो गयी बारूद ।
गाँव का गाँव बीबी बच्चों सहित
खूनी हो गया शातिर निशानोबाज़
हत्यारे बच्चौ औरतों को मारक ट्रैनिंग
मिलती और वरदी का लहू
शिकारी की तरह बहाते । जब
प्रतिशोध
में
पकङा धकङी गिरफ्तारी होती
लालकलम
जहर उगलती ।
ये घाव राजनीति पूँजी के लालच ने
दिय़ा
नासूर बनाया मौकापरस्त लाल
विचारकों ने तार विदेशों में।
©®©®¶©®©सुधा राजे
May 27 at 10:21am

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