Sunday, 12 January 2014

अकविता :रंग और रोशनाई

रंग की रंग बिखरे हैं सुखिया के चारों तरफ और बिखरी हैं चुहलबाजियाँ ।
काले पीले हरे गुलाबी लाल कत्थई भूरे सब रंग पहन ओढ़ लगा सजा रंगों पर
सवार सुखिया जा बैठी रंगों पर हर तरफ रंग और सुगंध बेला चमेली चंदन केवङा
खस और गुलाब. रंग औऱ खुशबुओं पर सवार सुखिया उङ चली और सबसे ऊँची डाल पर
जा झूली रंग गीत खुशबू और स्वाद सिर घूम गया मितलियाँ बढ़ गयी और सब उलट
दिया रंग खुशबू गीत और स्वाद ।
बचे थे काले घेरे गहरी झाँईया दुखते जोङ कर्कश आवाजें और भभके घुटन ।
सुखिया बावली हो गयी ।
हर वक्त गाती रहती है रँगती रहती है झूलती रहती है और चखती रहती है लेकिन
अब केवल दो रंग से सुर्ख और स्याह सुखिया को वर्णान्धता है ।रोज रंगती है
सब कुछ और चल देती है डोर काट कर झूले की दिन ढलते है दिखना बंद हो जाता
है औऱ देहलीज के सब रंग लाल और काले औऱ झूले की गाँठें बढ़ जाती है । हर
तरफ गाँठें हैं मन्नतो की सौगंधों की प्रण की औऱ जिद की कई बार झूले पर
भी सरकफूँद की गाँठ लगायी मगर सुखिया झूल नहीं पायी अकेली क्योंकि आजकल
नन्हों को रंगबिरंगी चीजें महक गीत झूले भाने लगे हैं सुखिया रोज छिपाकर
रख देती है रंग बू स्वाद गीत और उठा लाती है नीले काले अक्षर बिलकुल अपनी
पीठ पर पङे धब्बों जैसे ।
सोचती है ये काले नीले लाल अक्षऱ जूझ सकते है काले नीले लाल निशानो से
सुखिया मे झाँईयों पर सफेद दवा लगायी और झूला रख दिया ।
हर तरफ काले नीले लाल अक्षर रखने लगी बिलकुल बदन के धब्बों की तरह ।
नन्हों अब रंग नहीं रोशनाई लाने लगी है ।
©®सुधा राजे

No comments:

Post a Comment