Thursday, 23 January 2014

अकविता-::- निलंबित दर्द।

परिकल्पित कर ली गयीं ख़ुशियाँ ।और निलंबित किये जाते रहे दर्द।
पीङा जो हर दिन हर समय हर जगह उपस्थिति रही वचनबद्ध सी दैनन्दिनी के लेख
में हाजिरी रजिस्टर में जानबूझकर गैरहाज़िर लिखी गयी और अनुपस्थिति
दिखाते रहे हर दिन जबकि वह कभी भी अनुपस्थित रहा ही नहीं ।
ख़ुशी अक्सर उपस्थित लिखी गयी दर्ज की गयी हाज़िर जबकि वह वहाँ थी ही
नहीं यह मान लिया गया कि वह बस यहीं अरीब करीब है और बस आने ही वाली है।
संभावित रही खुशियाँ हाजिर हैं लिख दीं गयी दैनन्दिनी में और आशायित रहे
कि जब आने ही वालीं हैं तो दर्द को ग़ैरहाज़िर माना जाये।
जबकि
पीछे पलटकर एक एक पृष्ठ पलटा एक एक तह खोली हर अक्षर पर निग़ाह डाली ।
खुशी तो कहीं भी उपस्थित थीं ही नहीं!!
नहीं था कभी भी वर्तमान सुख हर्ष उल्लास!!!
हाँ हर पृष्ठ पर आने वाली खुशी का वर्तमान मानकर हाजिरी रजिस्टर जारी रखा गया ।
और निलंबित रखा गया दुख ।
जो मन ही नहीं तन में जीवन में व्यष्टि और समष्टि में कहीं तीव्र कहीं
मंद कहीं ओझल कहीं बोझल कहीं प्रकट कहीं छिपा उपस्थित रहा ।
दर्द नकारा गया बर्खास्त किया गया निलंबित रहा और परिकल्पना कर ली गयी
खुशियों की जो अरीब करीब थीं परंतु वर्तमान कहीं नहीं ।
आज फिर एक टीसता दर्द अनुपस्थित लिख रहीं हूँ और हाजिर लिख रही हूँ खुशी ।
उम्मीद की दैनन्दिनी में आशा के अक्षरों से कि वह आज के हिस्से की
जीवनकक्षा चालू होने तक आ ही जायेगी।
©®सुधा राजे
दतिया, म.प्र
बिजनौर, उ. प्र

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