Thursday, 24 July 2014

सुधा राजे का लेख --""तेरे पास जीने के लिए क्या है लङकी??""(भाग एक)

लेख ""तेरे पास जीने के लिए क्या है लङकी???!!!!! ""

(सर्वाधिकार कॉपी राईट एवं अनुवाद सहित लेखकाधीन ''सुधा राजे '')

'सामी 'मेरी सबसे प्रिय सखी 'एम ए एल एल बी अदीब क़ामिल करने के बाद उसकी
शादी माँ की बहिन के लङके से परिवार ने कर दी ।खूब जहेज़ और गहने कपङे
बाईक सब दिये लंबी चौङी दावत और ज़श्न के बाद,
'सामी 'ख़ुशी ख़ुशी 'अपनी वक़ालत शुरू करने का विचार त्याग कर गृहिणी बन
गयी पूर्ण कालीन बहू बीबी और चाची की तरह हर समय शौहर और सास ससुर की
सेवा में हाज़िर । 'सामी 'को पहले ही हफ़्ते पता चल गया कि शौहर की एक
प्रेमिका है और वहअपने निजी गैराज
पर जाते आते वहीं घंटों रह जाता है ।
शौहर को बताया था दीनदार किंतु वह शराब का आदी भी था और कैशोर्य से ही
चरित्रहीन ।
सामी जब गर्भ से थी तो उसने समझाने की कोशिश की होने वाली संतान का
वास्ता दिया रोयी गिङगिङायी ख़ुदा का ख़ौफ दिखाया बदले में मिली लातें
पेट कमर पीठ पर और धुँआधार गालियाँ

''पीता हूँ तो अपनी कमाई की पीता हूँ तेरे बाप का माल नहीं है ''शक्ल
देखी है आईने में? तेरा काम घर सँभालना है चुपचाप रोटी पका बरतन माँज और
पङी रह "

जबकि सामी के पिता की पूँजी भी गैराज में लगायी जा चुकी थी और एक कमरा भी
उसी पूँजी से छत पर तैयार कराया गया था ।

बच्ची पेट में मर गयी और सामी को कई हफ्ते तक डॉक्टर को नहीं दिखाया गया,
जब चीखते चीखते बेहोश हो गयी तो डरकर बूढ़े सास ससुर ने सामी के भाई को
फोन किया पङौस से तब सामी की ज़ान बची ऑपरेशन से बच्ची निकाली,
सामी के सपने टूट चुके थे । फिर भी वह दीनदार संस्कार वान लङकी घर बिगङने
के डर से चार माह बाद समझौता करा कर विदा कर दी गयी । हफ्ता भर भी नहीं
बीता कि मारपीट और ज़ुल्म चालू हो गये 'कि रिटायरमेंट पर बाप के पैसे से
हिस्सा ला ताकि वह अपना ट्रक खरीद सके ।
सामी गर्भ से थी और घसीट कर पीटी गयी । बेल्टों से जूतों से और रास्ते पर
फेंक दी गयी कि पैसा लाना तो आना ।
सामी के बेटा हुआ 'और फिर पैसे देकर बिरादरी ने समझौता कराकर भेज दिया
।अब सामी बीमार रहने लगी काम काज में पहले जैसी फुर्ती और मनभावना की
हुनर नहीं रहा सजना सँवरना सूनी सेज देखकर भला न लगता और जब कभी होता तो
मेल जबरदस्ती से होता एक तरह का रेप और कुकर्म भी । सामी ने माँ भाई से
लाख मदद माँगी मगर सब बदनामी का डर दिखाकर पीछे हट जाते सामी केवल
नौकरानी ही थी ।
अब निक़ाह के सामान पुराने हो गये और जेवर बेच कर शौहर ने गैराज पर लगा
दिये और तमाम सामान दो तीन रखैलों पर खर्च कर दिये ।सामी साबुन तेल मंजन
शेंपू दवाई चाय चप्पल अंतःवस्त्र जैसी चीज़ों तक को तरसा दी गयी ।
करीब के स्कूल में पढ़ाने की इज़ाजत माँगी तो जूते मिले और आवारा का ताना ।
पढ़ाई को गालियाँ तो रोज ही मिलती ।सुंदर सुघङ शालीन लङकी सामी से मिलने
जब हम पहुँचे तब वह पहचानी भी नहीं गयी । कमर तक लंबे बाल झङकर कंधे तक
पूँछ से बचे थे गेंहुआ सलौना रंग काला और भरा बदन काँटा हो चुका था आवाज
रोते रहने से मधुरता खो चुकी थी ।
सामी नाटक करती रही सुखी होने का किंतु बचपन की सखी से कब तक नाटक चलता ।
शौहर आया उसका तो दो पल नहीं लगे ताङते कि दोनों में एक हुकूमत के घमंड
में तो दूसरी बेबस पिता की मौत के बाद से बेटे की परवरिश जगहँसाई के डर
से लाचार ।
कुछ महीने बाद सामी का खत मिला कि उसको तीन तलाक देकर घर से बाहर धकेल
दिया बच्चा भी भगा दिया और एक पङौसी की मदद से बस में बैठकर वह मायके आ
पङी है अब भाई भाभी ने दम खा रखा है कि बेटा छोङ दे तेरा बोझ कैसे उठायें
पहले ही बेवा माँ कम है क्या ।
हमने सामी से मिलने की ठानी और कुछ हफ्तों के बाद घर में दो कमरे सामी की
माँ ने ले लिये अपने और बेटी के लिये ।
सामी वकालत नहीं कर सकती थी कॉन्फिडेंस एकदम गिर चुका था और सेहत खराब थी
बच्चा छोटा ।मरदों के बीच बेपरदा बैठने पर इलज़ाम का डर ।आखिर उसे एक
स्कूल में जॉब मिली और धीरे धीरे वह अपना खर्चा निकालने लगी ।अम्माँ जिस
पेंशन पर पहले चुपचाप अंगूठा लगाकर बेटे को दे देतीं थी वह अम्माँ ने
रखनी शुरू की तो रोटियाँ बंद कर दीं बेटे ने ।
सामी ने माँ और अपने बेटे दोनों को सँभाल लिया ।
बिरादरी के लोग तमाम बातें बनाते वह बिना परदे के पढ़ाने जाती और मुकदमा
लङकर सामान वापस ले लिया निकाह का हालांकि सब तोङ फोङकर दिया और तमाम
ज़लील करके मेहर दिया जिसे उसने फिक्स कर दिया गस साल के लिये ।
बेटा छीन ले गये ।बेटा जब बीमार पङ कर मरने की नौबत आयी तब वापस सामी को
दिया कि बालिग होने पर वापस लूँगा और रखैल घर ले आया ।
सामी के लिये तमाम बूढ़े विधुर निकम्मे प्रौढ़ रिश्तेदार शादी को पैग़ाम
भेजने लगे अनेक को तो दूसरी तीसरी बीबी बनाने का शौक़ था ।
किंतु सामी अब जाग चुकी थी ।वह आगे टीचर ट्रेनिंग में शामिल हुयी
बहुप्रतिभाशाली थी सो अंततः परमानेंट जॉब मिल गयी ।
अम्माँ ने आधे मकान का बैनामा सामी के वाम जब किया तो भाई भाभी ने दोनों
को मारा पीटा अंततः दरवाजे बँट गये और सामी माँ के हिस्से में रहने लगी ।
हमने कुछ रिश्ते बहुत फूँककर बताये तो एक ही ज़वाब मिला """अब नहीं ""अब
इन हड्डियों में मार खाने की ताक़त और दिल में किसी के ताने पीने का सब्र
नहीं ""
शादी करके देख ली बच्चा भी पराया है ।रहा ये ज़िस्म सो अब इसपर कितने दिन
मर्द को बाँधने को माँस बचा है?
तब से जहाँ कहीं भी मैं जाती हूँ हर लङकी से केवल एक ही बात कहतीं हूँ
''पहले एक जॉब पकङो फिर शादी करो और अपनी जॉब कभी मत छोङना । पहला बच्चा
होने से पहले तय कर लो कि घर की जिम्मेदारी आधी आधी बाँटनी पङेगी और पालन
पोषण में हाथ बँटाना पङेगा । क्योंकि आज भी बहुतायत पुरुषों को बरतन
माँजना खाना पकाना टॉयलेट साफ करना पोंछा लगाना बच्चों के लिये बोटल भरना
बस्ता लगाना और होमवर्क कराना कपङे धोना
''जोरू की गुलामी लगते हैं "
यानि अमूमन एक बहुत बङी आबादी में घर के भीतर की हर सेवा औरतों पर ही
जबरन या स्वेच्छा से दीन ईमान कर्त्तव्य कहकर थोपी हुयी है । या तो पूर्ण
कालीन वी है स्त्री या फिर जॉब करने वाली कामकाजी गृहिणी ।अर्थात हर हाल
में घरेलू सेवायें औरतों का ही काम माना जाता है ।अपवाद स्वरूप बहुत कम
परिवारों में पति छोटे मोटे कार्यों में बाथ बँटाने लगे है ।किंतु गंदगी
साफ करना तो फिर भी हर हाल में या तो नौकरानी करेगी या गृहिणी करेगी ।
विवाहेत्तर संबंधों में लिप्त पति से भी धोखा खाकर जाने कब शादी तलाक में
बदल जाये का डर भी है ही । साथ ही डर है बीमारी एक्सीडेंट प्राकृतिक आपदा
नौकरी चली जाने और चोरी डकैती आगजनी में लुट जाने का और यदि पति को कुछ
हो गया तो प्रौढ़ विगत यौवना माँ का बच्चे लेकर दर दर की ठोकरें खाने का
डर है ।
न जाने जीवन के कि पङाव पर कौन किसे छल जाये वक्त और हालात से ।
इसी लिये हर लङकी के सबसे पहले कम से कम स्नातक तक शिक्षा हासिल करनी
चाहिये फिर एक जॉब पकङनी चाहिये तब सब प्रकार की बातें पहले ही परख कर
कहकर शादी करनी चाहिये ।
शादी दोनों की होती है बच्चे भी दोनों के है तो जब माँ पेट में बच्चा
रखती है घरेलू सेवायें पुरुष करे और जब बच्चा छोटा है तक आधा आधा काम घर
का बच्चे का और बाजार का बाँट लिया जाना आज के समसामयिक जीवन का सबसे
स्वस्थ नजरिया है ।मातृत्व के बाद स्कूल के काम भी बाँटे जाने चाहिये
"होमवर्क एक कराये तो दूसरा टिफिन तैयार करें और जो एक छोङने जाये तो
यूनिफॉर्म दूसरा धोये प्रेस करे ।
पैरेन्टिंग के काम पहल करके बाँटने है यह पहले ही परख कर तब बच्चा जन्मने
का फैसला लिया जाये ।
वर्तमान समय के संक्रमण कालीन दौर के हिसाब से तो यह सही है कि लङकियाँ
कोई भी फ़ैसला भावना की बज़ाय विवेक से लें और "पहला बच्चा "विवाह के दो
साल बाद ही करें ।आज इतने सुरक्षित गर्भनिरोधक उपाय आ चुके हैं कि विवाह
से पहले ही लेडी डॉक्टर से मिलकर पता कर लें कि कैसे दो साल तक बच्चा
पैदा नहीं करने की रोकथाम की जाये ।
उन दो साल के दौरान ससुराल पति बच्चे को लेकर नये परिवार का दृष्टिकोण
बेटी बेटा की चाहत और दांपत्य के साथ जॉब को नयी ज़िम्मेदारी के हिसाब से
सैटल करने का पर्याप्त समय मिल जाता है ।
बच्चा कब जन्म ले यह समय तय किया जा सकता है और कहाँ पैदा हो कहाँ आराम
करना है वे छह

महीने भी तय किये जा सकते है ।प्रेगनैंसी के दौरान और डिलेवरी के समय
कौन करीब रहेगा ये व्यवस्था की जा सकती है । बच्चे को स्कूल जाने के दिन
तक क्या क्या पृथक अरेञ्जमेंट चाहिये वे सब सामान और व्यक्ति जुटाये जा
सकते हैं ।
तो शिक्षित होना पहली जरूरत और दूसरी है जॉब तीसरी है सही मेल की शादी और
चौथी है पहला बच्चा दो साल बाद ।
दूसरे बच्चे के बारे में कम से कम छह साल बाद ही सोचें ताकि पहला बच्चा
मदद कर सकें छोटे की परवरिश में ।और एक बच्चा पूरी तरह पेरेंटिंग पाकर
सँभल चुका हो ।


मेरे अपने हालात ऐसे बिगङ जायेंगे मैंने भी सोचा नहीं था । अच्छी खासी
लेखिका प्रसिद्ध हो चुकी थी और हाईकोर्ट की वकील भी समाज के सुधार
कार्यक्रमों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती थी और अपने प्रण के मुताबिक पिता
की मरजी से चुने गये परिवार में शराब नही दहेज नहीं की रीति पर विवाह
किया था ।
परंतु बहुत जल्दी ही अहसास हुआ कि 'दहेज 'माँगा नहीं किंतु वांछित तो था
। वकालत छोङकर परिवार का दिल जीतने का मन बनाया और हर तरह से सबकुछ मन
वचन कर्म से करने लगी । तभी एक हादसे में पति की रीढ़ की हड्डी
क्षतिग्रस्त हो गयी । मेरे सामने उनके ऑपरेशन के लिये लाखों रुपये जुटाने
के लिये जेवर और जमीन बेचने के सिवा कोई विकल्प नहीं था । स्वाभिमानी
लङकी मायके से कब हाथ पसारती है और बिन माँगे मदद करता कौन है । दिल्ली
गाजियाबाद कोटा बूँदी जयपुर तब जाकर ऑपरेशन कराया और विशेष तकनीक से
प्राप्त मातृत्व भी ढोया क्योंकि आशंकायें बहुत थीं । सफलता या असफलता की
।कुछ साल ऐसे गुजरे कि वकालत करने की तो गुंजाईश ही नहीं थी बेड पर बंधे
पति और गोद के दोनों बच्चों के साथ बेड पर करवट तक लेने में असक्षम ससुर
की भी जिम्मेदारी थी ।
तब समाज सेवार्थ की गयी टीचिंग के अनुभव काम आये और शहर की मेडिकल शॉप
बेचकर गाँव आ बसे वहीं कोचिंग खोली और सिलाई सिखानी जारी की । पति जब
ठीक हुये तो एल आई सी का काम शुरू कर दिया । कुछ साल बाद वकालत एल आई सी
और ट्यूशन से ही जीवन फिर चला ।
साठ किलोमीटर की प्रतिदिन यात्रा और दिन भर काम रात देर से सोना सुबह
जल्दी जागना ।
लगभग दस साल बाद अँधेरा छँटा और पति ने खेती शुरू की दुबारा मेडिकल चालू
किया ।खुद किराये पर रहकर हमने निजी घर किराये पर दे रखा था । बच्चे साथ
साथ काम करते घर पर साग सब्जी लगायी औऱ कुछ भी फालतू नहीं खरीदा ।तब समझ
आया कि जॉब भावुकता में छोङना मेरी भूल

आज बीस साल हो गये रात अब भोर की तरफ है लेकिन पूरे सत्तरह साल कलम बंद
रही और मंच का मुँह नहीं देखा । अपने क्रूर कङवे अनुभव से कहती हूँ
लङकियो! आत्मनिर्भर बनो तब शादी करो जॉब का विकल्प शादी नहीं

--
Sudha Raje
Address- 511/2, Peetambara Aasheesh
Fatehnagar
Sherkot-246747
Bijnor
U.P.
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Mobile- 9358874117

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