Thursday, 31 July 2014

सुधा राजे का लेख -""दासता बनाम संस्कृति"" (भाग 1)

व्रत उपवास को ""नारीवाद ""के
चश्मे से देखना बङा उपहास प्रद है ।
किसी भी मजहब में हो
प्रार्थना और तप
संयम की सीख के अंग है ।
कुछ ""पढ़ें भी ।
सब तपस्यायें पहले पुरुषों ने भी की है

मंदिर मसजिद गुरुद्वारा गिर्जाघर
कहीं भी
जाकर
मनुष्य क्या माँगता है???
परिवार की खुशी
दीर्घायु सुख प्यार आरोग्य और
परमात्मा की कृपा ।आपदाओं से
रक्षा!!!
स्त्री और पुरुष दोनों ही ये सब
माँगते हैं ।
अब जिसको जो जो ""प्यारा वांछित
और जरूरी लगता है माँगता है ""
औरतें
रोज़ा रखकर क्या माँगती है???
पुरुष
प्रदोष एकादशी मंगल और
नवरात्रि व्रत शिवरात्रि व्रत
कांवङ यात्रा अमरनाथ मानसरोवर
चतुर्धाम व्रत रखकर क्या माँगते
है????
धर्म?
अर्थ
काम
मोक्ष
,,,,नौकरी रोजगार मकान दुकान
बेटा बेटी विवाह पत्नी और दैहिक
बल बुद्धि सत्ता ।
सब का क्या करेगे?
परिवार
और अपने प्रयजनों के सुख पर ही खर्च
करेगे???
विकृतियों की बात मत कीजिये ।
विकृतियाँ तो स्त्रियों में
भी ""शोचनीय स्तर तक जा पहुँची है
"
कोई "भाई
नहीं कहता कि मारूँगा पीटूँगा वरना मेरे
लिये दूज दशहरा राखी व्रत कर!!!
किंतु बहिन को प्यार है अपने वीर से
तो रखती है चुपके से आँसू बहाती है
भगवान के आगे मेरे भाई
की रक्षा करो उसे जॉब दो बरकत
दो औलाद दो वगैरह ।
कोई नहीं थोपता था कि "मनवांछित
वर पाने को व्रत रखो "
किंतु "जिसको विश्वास
होता था कि ""ईश्वर मेरी भूख
हङताल से दयालु हो जायेगा और
मेरी बात मान लेगा वह
रखती थी कठोर व्रत "असंभव वर
पाने को संभव करने को "
पुरुष
भी तो करते रहे तमाम पूजा पाठ
अपनी वांछित लङकी से विवाह करने
को ।
चाहे यह सब दिखाना संकोच वश न
कहें ।
गांधी जी ने अनशन कर करके हुकूमते
ब्रितानिया ने बार बार बात
मनवायी
ऐसे ही एक आमरण अनशन के समय
नोआखाली के दंगाई कातिल लहू
सनी तलवारे खंजर चाकू लेकर गाँधी के
चरणों में रो पङे ।
अन्ना हजारे की तेरह दिन की भूख
हङताल ने सारा देश झुका दिया ''सब
कह उठे मैं हू अन्ना "
और विवश सरकार को लोकपाल
विधेयक बनाना पङा ।
ये सब व्रत केवल पति के लिये
ही तो नहीं!!
कुछ ही हैं ।
लेकिन मानो या नहीं ये कठोर सच है
कि "पुरुष कठिन और जोखिम
भरी परिस्थितियों में कार्य करते हैं

स्त्री सहनशील संयमी है प्रकृति से
एक कमाता है दस खाते हैं । वह
सारी ऊर्जा सबकी जरूरतें पूरी करने
पर व्यय कर देता है ।
और सबकी सब सहूलियतें इस बात पर
निर्भर हैं कि "कमाऊ रक्षक सलामत
रहे "
बस हर माँ बहिन बेटी इस सत्य
को जब समझ लेतीं हैं तब ""ईश्वर से
हठ पूर्वक प्रार्थना मनवाने
की कोशिश करतीं हैं ।
चाहे मिस्सा बलिदान फ्राईडे फास्ट
रोज़ा जुम्मा रोजा
या
विविध प्रांतों में प्रचलित विविध
व्रत हो ।
शिव पार्वती
जैसा संग और प्रेम चाहने के लिये
पार्वती की तीजें व्रत
मनायीं गयीं ।
किसने कहा कि व्रत करो?
मन नहीं तो मत करो
किंतु किसी की आस्था को
नारीवाद के नामपर "दुआ करने से मत
उपहास बनाओ"

कोई । ईश्वर से क्या क्या माँगता है "ये
उसकी व्यक्तिगत भावना का विषय है "।
आज के अल्ट्रा मॉडर्न युग में भी ""संयम
और आत्मनियंत्रण इंन्द्रिय निग्रह
""उतना ही जरूरी है जितना त्रेता में
था । चाहे पुरुष
हों या स्त्री यदि नास्तिक
भी हों तो भी अपने अपनों और
अपनी चीज़ों के लिये ""कल्याण
"की भावना तो रखते ही हैं । अब
धार्मिक लोग इसके लिये रोज़ा व्रत
फास्ट इबादत पूजा पाठ करने लगे बस्स।
यदि कोई धार्मिक माता अपने परिवार
के लिये ''सोलह सोमवार सावन भादों के
मंगल या रोजे नमाज या जपुजी और
सेवाजी करती है तो """इसमें कोई
हेयता कैसे घुस गयी?? हर
स्त्री जो पति से प्यार करती है
या प्यार नही भी तो भी अपने परिवार
की रीतिवश साथ रहती है जानती है
कि ""पति को सेहत सफलता और लंबी आयु
मिले तो बच्चों सहित उसका भी भला है
"""वह ""चुपके से करे परंतु
प्रार्थना तो करती ही है।
अगर एक स्त्री में संयम
नहीं होगा इंद्रिय निग्रह
नहीं होगा परिवार के कल्याण के लिये
सच्ची भावना नहीं होगी तो?निःसंदेह
एक परिवार का सत्यानाश निश्चित है ।
किंतु इसका कदापि ये अर्थ नहीं है
कि जो जो स्त्रियाँ व्रत उपवास
पूजा पाठ नहीं करतीं वे
पति बच्चों परिजनों का भला नहीं चाहतीं ।
ये विशुद्ध अंतः करण का मामला है ।
अनेक स्त्रियाँ कोई भी व्रत
नहीं करतीं और इसके विपरीत अनेक पुरुष
कठोर साधना करते हैं ।प्रश्न है "उद्देश्य
का ""अकसर पुरुष भी परिवार और स्वयं
का भला ही चाहते हैं ।किंतु इससे न
तो नारीवाद आहत होता है न
स्त्री कोई हेय है ऐसा ध्वनित होता है।
हमारे परिचित अनेक पुरुष कांवङ लेने
जाते है पैदल व्रत करते हुये आते आते पांव
जख्मी हो जाते हैं '''कुछ
की मनोकामना ""अच्छी पत्नी और संतान
पाना भी होती है '"""हमारे विवाह के
बाद हमारे ससुर जी वृद्धावस्था में
भी कांवङ लाने गये ''बहू आने की खुशी के
धन्यवाद में ""तब सारे रिवाज पता चले
"""चूँकि सास नहीं थी सो "अहोई व्रत
भी करते थे ''पुत्र के लिये "।
तीज कोई अकेले पत्नियों का त्यौहार
नहीं है ।आप कभी पश्चिमी उप्र में आकर
देखें ""भाई और भतीजे पिता ""अपनी दूर
पास रहतीं बेटियों बुआओं पोतियों के घर
जाते है 'और
वहाँ ""सिंधारा या सिंझारा देकर आते हैं
।ये होता है कपङे चूङियाँ मेंहदी और घेवर
कुछ रुपये ।अब इसमें गुलामी खोजने से पहले
सोशल स्ट्रक्चर को देखना पङेगा ।
कृषि और कलाकारी प्रधान देश का मुख्य
आय स्रोत कृषि और हर रिश्ते के पुरुष पर
डाली गयी ""स्त्रियों की जिम्मेदारी ""आज
धारा 125के तहत भरण पोषण
का दावा करने
वाली किसी भी उपेक्षित स्त्री को ये
दावा ""दासता नहीं हक नजर आता है?
जबकि दासता वहीं है जहाँ कोई
देना ही नहीं चाहता और हाथ
फैलाना पङता है ।पिता जिस तरह पुत्र
को देता है बङा भाई छोटे भाई
को देता है ।बाबा पोते को देता है ।
चाचा भतीजे को देता है ।इसी तरह
मनीषियों में हर ऋतु के हिसाब से
स्त्रियों के उल्लास के लिये तीज
त्यौहार के बहाने रचे ।अब तीज पर
क्या करतीं हैं स्त्रियाँ??खूब सजती है ये
सजावट के पैसे कौन देता है?
पिता पति बाबा और भाई,,,,,,नये कपङे
नये गहने नयी मेंहदी उबटन श्रंगार और
बङे मंदिर या बाग पार्क
या कहीं खुली जगह में झुंड में
इकट्ठी होकर झूलना गीत गाना और
पूजा करके परिवार के लिये मंगल
कामना करना ।
क्या किटी पार्टी मनोरंजन
का बहाना है? तीज नही??
क्या ब्यूटी पार्लर खुशी का बहाना है
घर के उबटन मेंहदी सजावट नहीं??वाटर
पार्क और सिनेमाघर सुख देता है पिकनिक
भी ।तो क्या बाग बगीचे मंदिर में
झूलना और रस्सी कूदना नहीं??क्लब और
बार डिस्कोथेक और सङक पर बारात और
स्टेज शो में नाचना मन बहलाता है ''तीज
पर घरों के बीच इकट्ठे होकर
नाचना दासता है??ये पर्व बनाये
ही इसलिये गये कि पुरुष कर्त्तव्य के
प्रति जागरुक हों और हर तीज त्यौहार
पर पत्नी बहिन बेटी को कपङे गहने
रुपया और मेल जोल मेला झूला गीत नाच
की मोहलत दे सके ।वरना तो पुरुष
खेती और मजदूरी व्यापार
का बँधा स्त्री रसोई बच्चे और घर बार
की बँधी ।ये नीरसता टूट जाती है ।चाव
से जब सजकर लङकियाँ सहेलियों के साथ
गाती खिलखिलाती है!!!दासता?गेट
टुगेदर पार्टी नहीं?दासता बर्थ डे पर
केक कैंडिल और हैप्पी बर्थ डे गाकर
ताली बजाना नहीं?????दासता होटल में
हनीमून मनाने की होङ नहीं???
दासता न्यू ईयर पार्टी के नाम पर
हुङदंग मचाना नहीं ???दासता शराब
सिगरेट पीकर
अंग्रेजी गालियाँ बकना नहीं???भारत
माता ग्राम वासिनी ।ग्रामीण
स्त्रियों की किटी पार्टी है तीज गेट
टुगैदर है वय सावित्री गणगौर न्यूईयर है
और होली है ""रेन डांस "ये त्यौहार मेले
लाते है दुख की धूल झङाते हैं ।
राखी बाँधकर भाई से डिजायनर कपङे
लेना दासता नहीं??पिता के घर से बार
बार रकम उपहार और छठी दशटोन भात
की रकम उपहार लेना दासता नहीं??सच
कहे तो ये ""त्यौहार बहुत सोच समझकर
रखे गये है जो टूटते दरकते मन को मन से
जोङ देते है परिवार की डोरियाँ नवीन
करते है और कर्त्तव्य बोध कराते है पुरुष
को कि स्त्रियों को उपहार रुपया गहने
जेवर और खेल कूद गीत नाच का अवकाश
भी चाहिये सहेलियाँ भी और मायके
जाना भी ।अपनी कमाई का चौथा भाग
घर की स्त्रियों के गहने कपङों जेवर और
मनोरंजन पर खर्च करना तमाम
गृहसूत्रों में यूँ ही नहीं लिखा उनके लिये
दो दर्जन पर्व भी बनाये ताकि कोई भूल
न हो अगर दासता है तो है
अपनी संस्कृति में खोट और विदेशी में
अंधानुकरण करना ।तीज त्यौहार
तो उल्लास के लिये रचे है मनाईये बढ़
चढ़कर ।
©®सुधा राजे

--
Sudha Raje
Address- 511/2, Peetambara Aasheesh
Fatehnagar
Sherkot-246747
Bijnor
U.P.
Email- sudha.raje7@gmail.com
Mobile- 9358874117

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