Thursday, 6 July 2017

​भूमि पुत्र हम कृषक दीन क्यों ?(लेख)-सुधा राजे

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भूमि पुत्र हम कृषक दीन क्यों ?
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सुधा राजे 
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भारत का अधिकांश ग्रामीण नागरिक कसबाई और वनवासी समाज कृषि या कृषि आधारित व्यवसायों पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से निर्भर है ।भूमि का भारत का कुल क्षेत्रफल 329मिलियन हेक्टेयर है कुल कृषि योग्य क्षेत्र 195मिलियन हैक्टेयर है और उसमें भी कृषि बोयी जाती  भूमि मात्र 141मिलियन हैक्टेयर है जिसमें कुल सिंचित भूमि 65.3मिलियन हैक्टेयर है  ।
पअब चाहे वे अनाज फल सब्जी के सीधे सीधे विक्रेता हों ,आढ़त वाले ,भारवाहक, माल संरक्षण शीतगृह संचालक, ड्राईवर ,वाहन मालिक ,डिब्बाबंद रस शरबत जैम जैली मुरब्बा अचार पापड़ चिप्स दलिया फ्लैक्स बिस्किट्स आटा सूजी मैदा बेसन आरारोट, तेल ,घी, दूध, दही ,पनीर, मावा, छैना, मट्ठा, लस्सी, छाँछ,मिल्क पाऊडर, सब्जियों के आयात निर्यात से जुड़े लोग हों या मसाले दालें ,चीनी खांड, गुड़ चावल गेंहूं मक्का ज्वार बाजरा रागी जौ आदि के उत्पादक विक्रेता निर्यातक प्रसंस्करणमिल फैक्ट्री संचालक हों या कृषि भूमि पर श्रमिक ।सबके हित अहित धरती पर हुयी उपज से ही प्रारंभ होते हैं ।किंतु आज भी कृषक होना सम्मान की बात नहीं समझी जाती ।जब बात आती है परिवार का परिचय बताने की तो बहुत गर्व से कहा जाता है डाॅक्टर इंजीनियर आई ए एस विधायक सांसद वकील पत्रकार मैनेजर इंस्पेक्टर मेजर कर्नल पायलट किंतु कृषक पिता भाई माता या नाते रिश्तेदार का परिचय बहुत झिझक हीनभावना दबे स्वर के साथ बताना पड़ता है अन्यथा एक तरह से इस उल्लेख से तब तक बचा जाता है जब तक कि विवशता न हो ।उच्च शिक्षित लोग तक भू स्वामी होना तो स्वीकारते हैं किंतु स्वयं कृषक होना स्वीकारने में हिचकते हैं ।इसका कारण है कृषक की छवि ,जो सदियों से आधी धोती आधा कुरता आधी पगड़ी मैली कुचैली ,धूप में जलता बदन काला रंग बूढ़ा शरीर हल बैल गोबर मिट्टी कीचड़ पसीना और निरक्षरता की बनायी जाती रही है ।भारत की तुलना में यूरोप अमेरिका का कृषक सम्मानित व्यक्ति है ।कारण है वह अत्याधुनिक यंत्रों के सहारे उन्नत से उन्नत तकनीक अपनाकर संपूर्ण कृषि करता है ।अत्याधुनिक सुविधाजनक वस्त्र पहनता है और अत्याधुनिक तकनीक के सहारे कृषि सहायक अन्य कार्य जैसे पशु पालन मत्स्य पालन कुक्कुट पालन मधुमख्खीपालन रेशम उत्पादन खाद्यान्न प्रसंस्करण एवं फल फूल सब्जी आदि सहफसलों का उत्पादन मदिरा जैम जैली शरबत अचार स्नैक्सेज और अन्य परिवर्धित संवर्धित वस्तुओं का भी उत्पादन करता है ।भारत में आज भी आधुनिक संपन्न कृषक बहुत हुआ तो ट्रेक्टर थ्रेसर कल्टीवेटर टीलर हैरो पानी की मोटर या इंजन और स्पेलर से ही परिभाषित हो जाता है ।बहुत कम और दुर्लभ दृश्य है कि एक कृषक उच्चशिक्षित होकर भी कृषि को मुख्य व्यवसाय के रूप में अपनाकर वहीं रहकर पशुपालन साग सब्जी फल फूल जड़ीबूटियां  बकरी गायभैंस मधुमख्खी रेशम मत्स्य कुक्कुट पालन और अन्नादि का उत्पादन तथा अंतिम अवस्था तक संपूर्ण प्रसंस्करण से जुड़ा है और निर्यात व्यापार दोनों कर रहा है । ऐसा अब तक इस मानसिकता के ही कारण है कि खेती तो अनपढ़ गवार गंदे असभ्य और पिछड़े लोगों का काम है ।इसी कारण कोई कलेक्टर डाॅक्टर एक्टर का बेटा तो विरासत सँभालने के सपने देखता है परंतु कृषक की संताने पढ. लिखकर कृषि से पीछा ही छुड़ाना चाहतीं हैं ।परिणाम युवा शक्ति और शिक्षित वर्ग का कृषि में योगदान नगण्य होता आ रहा है । शहर से पढ़कर लौटा बेटा तो लकदक सूट टाई पेन्ट कोट में खेत पर जाता कृषक पिता तक को नहीं सुहाता वह जाये भी तो बापही कह देता है रहन दे अब मेरी तो कट गयी जैसे तैसे किंतु तू क्यों कीचड़ माटी में सन रहा है । कृषक कुरूपता कठोरता भदेसपन और असभ्यता का प्रतीक ही जैसे बन गया । विश्व भर की पेट की आग और तन पर का वस्त्र सब कृषि की ही उत्पादक क्षमता पर निर्भर हैं क्योंकि व्यक्ति चाहे चांद पर रहने लगे अंततः खायेगा तो फल सब्जी अन्न मांस दूध मसाले ही किसी न किसी रूप में !!!!न प्लास्टिक लोहा बिजली खा सकता है न मशीने मुद्रा कंक्रीट ही ।तब भी आज तक विश्व भर के नवनिर्माण पर कृषि प्रथम प्राथमिकता पर नहीं है ।क्योंकि आय का सीधे सीधे स्रोत खनिज शराब मिलें यंत्र अस्त्र शस्र और पर्यटन हैं ।
भारत के संपूर्ण कृषि रकबे को देखें तो भारत अन्य देशों की तुलना में बहुत भाग्यशाली राष्ट्र है ।परंतु आजभी बहुत पिछड़ी तकनीकों से वन्यक्षेत्रों के वनवासी ग्रामीण और कृषक खेती करते हैं ।कारण कि हमारे वैज्ञानिकों की पहुँच अब तक उनके घर में नहीं है । हाथ से चावल बिखेरकर ही छत्तीसगढ़ जैसी बेहद उपजाऊ भूमि पर वनवासी धान की खेती करते हैं ।आज की सबसे बड़ी और पहली आवश्यकता है कि प्रत्येक कृषक के पास एक बाईक जैसा ट्रैक्टर हो जिसे कम स्थान पर रखा जा सके पतली पगडंडियों से ले जाया जा सके और जो कीचड़ गहरी गारेदार भूमि में खपे नहीं न ही ऊपड़ खाबड़ पगडंडियों पर उलटे पलटे ,जिसकी कीमत इतनी कम हो कि दस बीघे का मालिक कृषक भी खरीद सके ।और जिसे चलाना सीखना इतना आसान हो कि साठ वर्ष का प्रौढ़ कृषक भी सरलता से सीख सके । क्योंकि भारतीय कृषि का भार औसतन चालीस से सत्तर वर्ष की आयु के ही लोगों पर है । युवा किशोर और अतिवृद्ध लोग प्रायः कृषि से दूर ही रहते हैं ।पढ़ाई लिखाई के बाद बहुत भटकने पर भी जब नौकरी धंधा कामयाब नहीं होता तब भी कृषक का बेटा कृषि की तरफ लौटता है। यह एक थक हार कर अपनाया गया रोजगार है । हालांकि बहुत से पढ़े लिखे लोग जिनको विरासत में बहुत बड़ी भू संपत्ति मिली है वे जब नौकरी मनचाही नहीं प्राप्त कर पा रहे हैं तब कृषि में बहुत नवाचार और वैज्ञानिक पद्धति से कार्य करने लगे हैं परंतु ऐसे आधुनिक कृषक प्रदेश तो क्या पूरे देश में भी उंगलियों पर गिने चुने हैं । आवश्यकता है कि इनकी पद्धति और सफलता को घर घर तक हर कृषक के सामने लाईव टेलीकास्ट या वीडियो के द्वारा पहुँचाया जाये ।परंतु कृषिविभाग नामक महकमा भी भारतीय सरकारी भ्रष्टाचार की बीमारी से ग्रस्त है और बहुत अधिक कारण इसका यह है कि कृषि पर बजट तो है घोषणायें तो हैं योजनायें तो हैं परंतु जिन कृषकों को इससे लाभ लेना होता हैवही नहीं जानता कि कृषि विभाग नामक महकमा है क्या क्यों है और उससे उसे क्या क्या समझना सीखना देखना और अपने लाभ लेना है ।निरक्षरता तो है ही अब तक इसका बड़ा कारण जिला मुख्यालयों से वास्तविक कृषकों की बहुत दूरी भी है ।उदाहरणार्थ अब तक शत प्रतिशत कृषकों के शत प्रतिशत खेतों की मिट्टी का परीक्षम तक नहीं हो सका ।जिसके कारण उनके खेत की मिट्टी में कम क्या है अधिक क्या है और कौन कौन सी फसलें बोनी चाहिये कौन सी नहीं तथा क्या क्या उर्वरक नहीं डालने है वरना मिट्टी और खराब हो जायेगी तथा कौन कौन से तत्व कम है जिनको पूरा करना अत्यावशयक है वरना खेत बंजर हो सकते हैं यह अब तक शत प्रतिशत कृषक नहीं जानते और अंधाधुन्ध खाद रसायन कीटनाशक यूरिया फास्फोरस पोटाश आदि भरे चले जाते हैं । ऐसा नहीं है कि सरकारी कर्मचारी ऐसा नहीं कर सकते ,परंतु बात यही है कि संकल्प शक्ति नहीं है नैतिक बल नहीं है ऐसा करने के लिये । एक विधायक गांव गांव पुरा पुरा द्वार द्वार जब वोट माँगने जा सकता है तो कृषि विभाग चाहे तो हर पांच साल पर प्रत्येक खेत का प्रत्येक नगर गांव कसबे के कृषक का खेत देखकर वहां की मिट्टी का परीक्षम करवाकर चार्टवार कम्यूटर पर सारी जानकारी आॅनलाईन इंटरनेट पर ही उपलब्ध करवा सकता है जिसे दूरूह से दूरूह दुर्गम क्षेत्र तक का कृषक अपने आधार कार्ड के सहारे जोड़कर घर बैठे पढ़कर या बच्चों से पढ़वाकर सुन समझ और तदनुसार लाभ भी उठा सकता है ।प्रायः कृषक सरकारी नौकर कर्मचारियों अधिकारियों के षडयंत्रों का ही शिकार है ।उदारणार्थ मेरे ही निरक्षर ससुर ने जब मेरे यहां आने से पूर्व कर्ज लिया इंजन बैल चकबंदी आदि के लिये तब कर्ज की रकम लिखी कागज पर कुछ और थी मिली हाथ में कुछ और ,साथ ही यह भी कि उनको यह ज्ञात ही नहीं था कि यह अवैध अनैतिक एवं भ्रष्टता का कार्य है । दस हजार से पचास हजार रुपये तक जब जिस देश के बैंक कर्मचारी अनपढ़ या कम पढ़े लिखे कृषक से लोन मंजूर करवाने दिलाने के नाम पर खरचा बताकर वसूल लेते हों और सुबूत कुछ न रहता हो तब कहना कुछ गलत नहीं होगा कि बैंक और कृषि विभाग की चालाकी का आसान शिकार है कमपढ़ा लिखा या सीधा सादा निरक्षर संसाधन विहीन गरीब कृषक । आज भी बैंक से पहले और बाद में भी किसान स्थानीसाहूकारों के पास बीज खाद मशीनें डीजल लागत आदि की एकमुश्त रकम का इंतजाम करने को कर्जा ले लेता है ।ऐसा बहुत कम होता है कि कृषक के पास अपनी ही क्षमता से अगली फसल बोने जोतने जेल्हने पाटने निराने सींचने गोड़ने और खरपतवार हटाने काटने दाअने उसाने ढोने और बेचने तक की प्रक्रिया तक को सब लागत पहले से ही एकत्र रहे । बहुत बड़े कहे जाने वाले कृषक भी इस दुष्चक्र का शिकार हैं । हमारा परिवार पूर्णतः कृषक है । लगभग पचास बीघे भूमि हमारे पास शेष है जिसमें से पचास बीघे भूमि ऐसे ही दुषचक्रों की भेंट चढ़ गयी । ससुरजी ने कर्ज लिया भूमि सँवारने को और चुकाने को भूमि बेचकर चुकाना पड़ा । पुश्तैनी कृषि के कागज ठीक न रखने की कीमत चुकाई ग्रामसमाज की भूमि कहकर पटवारी ने भूमि वह छीनी जो सदियों से उनके बापदादे जोतते बोते चले आ रहे थे उनको पता तक नहीं था कि यह एक दिन चकबंदी में छीन ली जायेगी । रास्ता निकाल दिया चौड़ा नौ फीट का खेतों पर से और मीलभर तक की उपजाऊ भूमि सड़क बनकर रह गयी । नहर निकाल दी खेत में से और वहां से पीछे खिसक गये खेत जलभराव का शिकार हो गये क्योंकि बहुत पढ़े लिखे साहबों ने कागज पर मिट्टी ढोकर लाने के पैसे डकारे परंतु वास्तव में बगल के ही किसानों के खेतों से मिट्टी उठवाकर सड़क पर बिछायी । समझिये कि बरसों लगते हैं खाद उर्वरक डालकर उपजाऊ बनाने में मिट्टी को वही ऊपरी परत सड़क पर खेंच कर बिछा दी गयी !!!किंतु मद लिखी गयी कि मिट्टी बाहर से लाकर डाली । इसके बाद भूमि चोरी होती गयी कि शातिर लोग हर बरसात के बाद अपनी मेंड़ तनिक और सरकाते रहे । आज पांच बीघे भूमि गायब है जो कि कागज पर है परंतु मौके पर कम है । अब न पूरा ब्लाॅक माप नाम होगा न ही वह चोरी की भूमि प्राप्त होगी ।किस का दमखम है जो सरकारी पटवारी गिरदावल कानूनगो तहसीलदार और क्लर्क के मुँह के दांत गिने !!किसान इस तरह मजबूर कर दिया जाता है पाई पाई को मोहताज ।कहने को हम भू स्वामी है परंतु भोर तीन साढ़े तीन चार बजे से रात देर तक लगातार बारहों महीने श्रम करने के बाद भी एक शिक्षक या क्लर्क के बराबर भी न बचत है न ही रहन सहन का सुख आराम । कारण कि उतने मँहगे कृषि यंत्र खरीदने लायक एकमुश्त पूँजी नहीं । कृषि किसी एक व्यक्ति का कार्य है भी नहीं ।जा फसल बोयी जाये तब भी बहुत सारे मानव श्रम लगते हैं एक साथ काटी जाये तब भी लगते हैं । यह समूह का कार्य है । श्रमिक को तत्काल मजदूरी चाहिये । मशीन को तत्काल डीजल बिजली पेट्रोल चाहिये । खेत को तत्काल बीज खाद उर्वरक कीटनाशक और निराई गुड़ाई सिंचाई चाहिये । एक अकेला व्यक्ति तो चौबीस घंटे भी काम करके दस बीघे तक की कृषि नहीं कर सकता ।इसलिये कृषक को एक मुश्त पूँजी चाहिये ।परंतु उसकी फसल ही उसकी पूँजी है समस्त देनलेन का एर मुश्त परिणाम ।वह चाहे अनाज के रूप में फल सब्जी के रूप में हो या गन्ना कपास दाल तिलहन के रूप में ।जब कटकर ढोकर नगर पहुँचेगी तो भारवाहक और वाहन चालक को तौलवाले को भी तुरंत रुपया चाहिये ।परंतु किसान को तो फसल का दाम कभी एकमुश्त एक साथ मिलता ही नहीं है । हम लोग अक्टूबर से मई तक लगातार मिलों को गन्ना सप्लाई करते जाते हैं और रुपया हर मजदूर हर वाहन हर श्रम का हाथों हाथ चुकाते रहते हैं परंतु हमें रुपया मिलों से दो दो हजार कभी पांच हजार कभी दस हजार करके पूरे साल दो साल कभी तीसरे साल तक में मिल पाता है । अब यदि इस धन को तत्काल जो जो देना पड़ता है बैंक से लेकर न दें तो करें क्या । परंतु बैंक तो ब्याज लगाता है न ??जबकि मिलें हमारा माल लेकर हमें कोई ब्याज नहीं देतीं चाहे रुपया दस महीने बाद दें या दो साल बाद। यानि हम कृषक अपनी सब पूँजी मिल या सरकार को सौंपकर दीनहीन पराधीन परवश कातर रह जाते हैं कि दाम दो तो कर्जा उतारें । उ.प्र. सरकार अबकी बार एक लाख तक का कर्जा माफ किया है परंतु वह भी केवल तीन हैक्टेयर तक के ही कृषक का । परंतु ऐसी कोई नीति नहीं बनी है कि फसल इस हाथ ले दाम तत्काल दे । बैंक के माध्यम से रुपया आने पर हमने व्यवहारिक कठिनाई यह झेली कि उन्हीं दिनों हम सपरिवार खेत पर होते हैं और उन्हीं दिनो कतार में बारह बारह घंटे लगने पर पता चल रहा कि  मुद्रा समाप्त कल आना । किंतु खेत पर खड़ा वाहन मजदूर इंजन तो कल नहीं आयेगा !!तो मरता क्या न करता फिर किसान स्थानीय साहूकारों के पास कर्ज लेने तला ही जाता है चाहे प्रतिभूति में घर रखना पड़े या जेवर या खसरा खतौनी ।
कृषक का धन एक मुश्त दिखता है कि तीन लाख पांच लाख की फसल हुयी । परंतु उसे बारह महीने वही सब से दस आदमी का परिवार भी चलाना है यह किसी के ध्यान में नहीं आता । प्रायः कृषक आर्थिक अवव्यवस्था का शिकार इस एक मुश्त रकम की सोच के कारण भी हो जाते हैं । मजदूर की मजदूरी आज औसत पांच सौ रुपये है । 365×500=182500 रुपये एक व्यक्ति की जो कि भूमि हीन है औसत मजदूरी हो जाती है । यदि किसी के परिवार में दो या तीन मजदूर है तो वह एक बड़े किसान से अधिक धन कमा लेता है ।यही कारण है कि दस पंद्रह साल बाद मजदूर मजदूर नहीं रहता परंतु कृषक वहीं का वहीं रह जाता है पचास वर्ष बाद भी क्योंकि परिवार पूरा का पूरा रात दिन खेती में ही लगा रहता है । मेरी दिनचर्या ठीक चार बजे भोर से प्रारंभ होती है सफाई भोजन पहले बाकी कार्य बाद में । कृषक खेत पर चला जाता है तो रात होने पर ही घर आता है । इसमें कोई छुट्टी नहीं कोई पिकनिक नहीं कोई बोनस नहीं कोई उत्सवी फंड नहीं न ही मनोरंजन के अवकाश हैं । बहुत अधिक बीमार हो जाना विवशता है अन्यथा कृषक परिजनों नातेदारों के घर भी कम ही जा पाते हैं । पच्चीस वरष के वैवाहिक जीवन में हम पांच पांच साल पर ही मायके जा पाते हैं क्योंकि मायका पांच सौ किलोमीटर दूर जो है । इसीलिये कृषक अपने नाते रिश्ते आसपास बीस से पचास किलोमीटर के ही दायरे में करते हैं । क्योंकि उनके पासमय ही नहीं खेत छोड़कर कहीं रात रुकने का । घर पर ताला तो कभी लग ही नहीं सकता क्योंकि गाय बैल भैंस को दाना पानी सानी कुट्टी खल गोबर साफ करना बांधना छोड़ना खूँटा बदलना नहलाना दुहना ,एक दिन तो क्या एक प्रहर के लिये नहीं रोका जा सकता । इसीलिये कृषक सपरिवार पूरा परिवार कहीं रात रुकने नहीं जा सकते बारी बारी से ही आते जाते हैं वह भी प्रायः बरसात के बाद के कुछ दिन जब बुआई हो चुकी हो । तब भी जलभराव के होने पर भर भर बरसती बरसात मेंभी घुटनों कमर तक जल नें भी मेंड़ काटने या बांधने पौध रोपने या गठियाने खेत पर जाना ही पड़ता है । नगर महानगर के फ्लैट कल्चर वाले लोगों को लगता है खेत ही घर होता होगा किसान का क्योंकि उनके दिमाग में फार्महाऊस के यूरोपियन खेत होते हैं ।परंतु कठोर नग्न सत्य यह है कि प्रायः खेत सांपों बिच्छुओं जंगलों वनों दलदलों नदियों तालों पहाड़ों पठारों और दुर्गम भूमियों के बीच होते हैं । अकसर किसान का सामना बाढ़ बरसात भूमि कीट मधुमख्खी सांप बिच्छू ततैया शेर तेंदुआ भेड़िया लोमड़ी गीदड़ सियार लकड़बग्घे और अजगर गोह छिपकली गोजर पटार जोंक आदि से होता ही रहता है । हमने ही पहले ही बरसैकड़ों बिच्छू सांप मारे ततैयां जलायीं और चूहे जोंक से जूझते रहे । उच्च शिक्षिता होने से उपहास नहीं होने दिया कृषक परिवार का परंतु स्वयं को संशय से देखा जाना सदैव चुभता रहा । कृषक परिवार की स्त्री न तो दिन में सो सकती है न दिन चढ़े तक सो सकती है न ही वह कोमल हाथ और नाजुक देह वाली रह सकती है । कठोरता रा ही जीवन अपनाना पड़ता है । संपन्न कृषक महिला मतलब क्विंटलों अनाज भरना फटकना छानना उड़ाना सहेजना और दाल तेल सब्जी साग समाले स्वयं ही कूटना पीसना तैयार करना । परिश्रम सपरिवार प्रत्येक आयु के व्यक्ति को करना पड़ता है । हमारी बच्चियां अबोध आयु से हर बार बुआई कटाई में खेत पर साथ होतीं हैं ,मेधावी होने से क्या होता है फीस तो कृषि से जाती है तो दो मजदूरों की मजदूरी बचती है न वही बहुत आसरा है । जंगल में हैं हमारे खेत जहां जल भर जाता है और बाघ तक आ जाते हैं । एक बार कालागढ़ डैम से अचानक पानी छोड़ दिया गया और सारे किसान पेड़ों पर चढ़कर पूरी रात लटके रह गये । जंगल में क्या पता चलता है भोर चार बजे घर से निकलजाने वालों को कि नगर में क्या सूचना समाचार है !!और कहां सब किसान अखबार पढ़ते हैं या टीवी रेडियो सुनते हैं । कृषक की रोटी सदा ही ठंडी और बहुत देर की रखी ही तो होती है । भोर चार बजे का पकाया भोजन नौ बजे खाता है  खेत पर तीन चार घंटे काम करके फिर दो तीन बजे वही खाना खाना है । बीच में पानी भी कहां सब खेतों पर होता है । शहर के लोग समझते है हर कृषक का अपना कुँआ और अपना इंजन अपना हैंडपंप अपना बोरिंग या अपना ट्रैक्टर हल बैल होता है । कितना भ्रम है !!जबकि एक कुआँ किसी के पास है तो सैकड़ों किसान किराये पर पानी लेते हैं । एक ट्रैक्टर किसी के पास है तो सैकड़ों किसान किराये पर जुताई बुआई ढुलाई कराते हैं ।एक वाटरइंजिन किसी के पास है तो सैकड़ों किसान किराये  लेकर सिंचाई कराते हैं । कहां पीने को ताजा ठंडा पानी होता है ?हमारे ही जिस खेत पर बोरिंग है वहां से मील भर दूर दूसरा खेत है तो बंद तालेवाली बोरिंग से दूसरे के खेत से पानी नहीं पी सकते इसलिये जब सींच नहीं चल रही तब पानी लेकर ही घर से जाना पड़ता है पहले घिल्ले घड़े छागलें थीं अब बोतलें चल पड़ी परंतु पानी ठंडा कहां !!कहां वहां कूलर पंखा छाया और बिस्तर है ?पेड़ भी दूर दूर ही तो होते हैं खेत में । घनी छाया तो खेत से दूर ही मिलती है सब काम निबटाकर जब रोटी खाने बैठते हैं तब जाकर तनिक तौलिया बिछाकर जमीन पर ही रोटी खाकर पानी  पीकर कमर सीधी करने किसान लेट लगा लेता है । कृषक के घर में रहना आसान नहीं है सारी ही दिनचर्या और वर्ष भर के सब कार्यक्रम कृषि चक्र के हिसाब से ही चलते हैं जब महानगरों के गैर कृषक लोगों की छुट्टियाँ होतीं हैं तब ही तो सबसे बड़ा और अधिक काम कृषकों के घर होता चैत काटने फसल गहाई करने दाअने उसाने और ढोकर मंडी तक बचे हुये को बंडा तक ला ला कर बंद करने रखने का क्योंकि तनिक सी देर हुयी और आग या बरसात सब खत्म कर डालेगी । आपदायें कौन सी कम हैं ओले बाढ़ कीड़े खरपतवार नीलगाय जंगली हाथी शूकर और हिरण प्रायः हमारे खेतों की ताक में रहते हैं । विगत एक दशक से हम लोगों ने दालें और ईधन चारे वाला ढेंचा बोना बंद कर दिया विवश होतर ,क्योंकि नीलगाय माहे सुअर और हिरण बहुत आने लगे हैं । नगर के लोग सोचते हैं कि बस खेत तो एक हरा भरा मैदान है और किसान करता ही क्या है सब तो मशीनों से होता है ।यह सोच केवल किताबी ज्ञान पर ही सिनेमाई दर्शन पर ही टिकी है । हमारे ही गांव में अब तक आज तक बिजली गिने चुने घंटों के ही लिये आती है ।मसाला सिलबट्टे पर पिसता है कपड़े हाथों से धुलते हैं पानी हैंडपंप चलाकर भरना पड़ता है और दालें चकिया से ही दलीं जातीं है अलबत्ता आटा अवश्य डीजल चक्की से पिसने लगा है और बैलगाड़ी की बजाय अब गांव से कसबे तक आॅटो और विक्रम बसे तथा ई रिक्शा चल पड़े हैं क्योंकि गांव से करीब से  हाईवे निकल रहा है । हमारे बच्चे मिट्टी के तेल की ही रोशनी में पढ़ते बढ़े हुये हैं ।रात को घर में घुप्प अंधकार गांव में भी अंधकार ही रहता है ।खेत जाने के लिये बस कुछ दूर ही सड़क है बाद में मीलों दूर तक कच्चे ऊबड़ खाबड़ जलभराव वाले रास्ते ही हैं जो बरसात में तैरकर तक जाने पड़ जाते हैं ।लड़के तो बस ट्रक की  ट्यूब से ही जा पाते हैं नदी पार के खेतों तक ।38से  48 °तापमान में जब लोग कूलर पंखे एयरकंडीशनर के सामने बैठे कोल्ड डिरिंक पी रहे होते हैं किसान को उस अप्रैल मई जून में अपनी फसल बचाने के लिये लगातार पानी बर्हाने जाना पड़ता है ।एक खेत से दूसरे खेत तक कभी नालियां बनाकर कभी पाईपलाईन बिछाकर पानी पहुँचाना पड़ता है और इंजन को उठाकर गाड़ी में चढ़ाकर फिर एक खेत से दूसरे खेत तक पहुँचाना पड़ता है ।इसी पर जंगल चोर सक्रिय हो चुके हैं जो तनिक से लोहे के लालच में कृषि यंत्र चुराकर बेच देते हैं । एक कृषक को सैकड़ों औजारों की आवश्यकता पड़ती है ।दरांती ,हँसिया ,खुरपी, फावड़ा ,गेंती ,कुदाली गँडासा ,रेती ,छैनी, कुल्हाड़ी ,बखिया ,टीलर, हल ,बखर, पटेला,कल्टीवेटर ,ट्राॅली ,इंजन ,या मोटरपंप, हथौड़ी,  आरी,  स्प्रिंकलर,कुप्पी ,बांट, तराजू, जुआ, पिआ, मउनी, सूप ,छलनी, दौरिया, सिकौली, अरई रस्सी ,टोकरा ,सलीता ,झल्ली ,बोरा ,बोरी , कुट्टी मशीन ,और वजन लाने ले जाने के लिये बैलगाड़ी या ट्रैक्टर ।कृषक का कार्य लुहार ,बढ़ई ,आढ़ती, मैकेनिक ,मोची, मिस्त्री, से लेकर बाजार के सब कृषि संबंधिक कार्य व्यापार और औजार या उत्पादन लेने देने वाले से पड़ता ही है ।किंतु इनमें से बहुत कम लोग सीधे कृषक के खेत पर जाते हैं ।भयंकर उमस के बीच जब सब गरमी घुटन की शिकायत करके घरों में दुबक जाते है टीवी इंटरनेट और रेडियो मोबाईल पर तब कृषक ताप घाम पसीने त्वचा के टैन और काले होने की परवाह किये बिना ही लगा रहता है कटाई गहाई ढुलाई में लगातार महीनों बिना नागा हर दिन ।हम लोगों को पहले सब अंग्रेजी जोड़ी कहकर चिढ़ाते रहे आज पच्चीस वर्ष कृषि पर रहकर दोनों ही सांवले और कठोर ग्रामीण वनवासी ही लगते हैं । चाहे कितने भी बहाने बनायें लोग किंतु सत्य यही है कि कृषि चीखती तो रही सरकार परंतु भारतीय प्रशासन शासन के मुख्य बिंदु पर कृषक सचमुच कभी नहीं रहा । वोट और राजनीतिक गुटबंदी के समीकरण तो जातिवाद सांप्रदायिकता और क्रिकेट क्राईम सिनेमा से ही प्रारंभ होते रहे हैं ।मीडिया में कृषक केवल तब आता है जब टिकैत की तरह का कोई नेता हंगामा खड़ा करता है या फिर किसान आत्महत्या कर लेता है । क्योंकि वास्तव में ही कृषि और कृषक की दशा और दिशा सुधारने का संकल्प सरकार और समाज में होता तो सबसे पहले बिना जाति मजहब के भेदभाव के पूर्ण कृषक के बच्चों को कृषि विज्ञान की तो शिक्षा कम से कम निशुल्क कर ही दी होती ताकि एक विरासत सँभालने वाली पीढ़ी स्वेच्छा से तैयार होती रहती । दूसरे जो सबसे बड़ी समस्या है वह है मानव बल ,यदि कृषक को अनेक मजदूर नहीं मिसते तो फसल बोने और काटने या सींचने में दो दिन की देरी तक का मतलब बरबादी हो जाता है ।आज तक हजारों मशीनें बन गयी परंतु एक आॅटोरिक्शा के आकार का ट्रैक्टर नहीं बन सका जो पहाड़ पर चढ़ सके चार पाँच फीट पानी में से निकल सके और जिसमें एक विक्रम बराबर तो सामान ढोया ही जा सके ।जिससे छोटी पूँजी वाले किसान अपने खेत स्वयं जोत जेल्ह बो, पाटा लगा  सकें । पाँच लाख का ट्रैक्टर वह कृषक कैसे खरीदेगा जिसकी कुल समस्त उपज का मूल्य एक वर्ष में तीन लाख हो जिससे कि बारह महीने परिवार पालना और अगली फसल की लागत भरनी है ।सस्ते और छोटे ट्रेक्टर थ्रेसर कटाईमशीने गहाई वाली ट्रालियां आज बहुत बड़ी आवश्यकता हैं ।भारतीय वैज्ञानिकों के समक्ष सैन्य आवश्यकता के यंत्रों से भी विकट चुनौती कृषि कार्यों के लिये सस्ते सरल संचालन वाले और छोटे किंतु शक्तिशाली यंत्रों का निर्माण है ।मुझे तो हर बार लगता है कि अब तक तो हल- बखर -पटेला तक का ही सही विकल्प नहीं ।क्योंकि विशालकाय भारी भरकम ट्रेक्टर केवल समतल पथ के ही खेतों पर जा पाता है ,जबकि भारत के प्रायः खेत पगडंडियों ढूहों ढाँणियों जंगलों पहाड़ों पठारों ऊबड़ खाबड़ जगहों के बीच दलदल नाला नदी नहर गड्ढों के पार बसी भूमि पर हैं जहां वह कंधे पर हल या बखर और बगल में बैल डुरियाये हुये ही ठीक से जा पाता है ।ऊपर से डीजल पेट्रोल महँगा है और उसके लिये नगर कसबे तक जाना पड़ता है । यहाँ जिम काॅर्बेट और चीला अभयारणय ,राजाजी अभयारणय  के आसपास के सारे ही खेत ऐसी ही जगहों पर है बस सड़क किनारे वाले छोड़कर ।सो सड़क किनारे के खेतों को तेजी से नगरीकरण होटल ढाबे रिसोर्ट और यूनिवर्सिटी बनाने वाले धनपति औने पौने दामों में विवश करके किसान से खरीद लेते हैं और कृषि भूमि का रकबा कम से कम होता जाता है ।
क्या भ्रष्टाचार की अघोषित किन्तु सर्वज्ञात बीमारी से ग्रस्त प्रशासन ऐसा कोई सचमुच ही कारगर कदम उठा सकेगा जिससे कृषि योग्य भूमि पर होटल ढाबा
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रिसोर्ट बहुमंजिली इमारतें काॅलेज यूनिवर्सिटी मसजिद मन्दिर मजार कब्रिस्तान श्मशान स्विमिंगपूल वाटरपार्क बाजार माॅल गैराज मिल फैक्ट्री आदि लगाना भयंकर अपराध घोषित हो और न कोई कृषक गैर कृषक कार्य हेतु भूमि बेच सके न ही कृषि रह चुकी भूमि कोई गैर कृषि कार्यों हेतु खरीद सके ?।
कृषि की भूमि को बंजर और बेकार बिना कागजी हेर फेर के और बड़ी सरलता से दिखाकर जिस तरह से आज पूरी सड़कों बस्तियों कालोनियों और हाईवे किनारों आदि के खेत कंक्रीट सीमेन्ट रोड़ी पत्थर ईंट से बरबाद कर दिये जा रहे हैं वे फिर कभी खेत नहीं बन सकेंगे यह सत्य है । क्या हमारी सरकार पूरी तरह सचमुच इस समस्या पर गंभीर है ?क्योंकि आज पचहत्तर वर्ष होते होते तो कहीं ऐसी सख्ती नहीं देखी गयी कि कृषि भूमि पर कुछ कंक्रीट बनने लगा हो और रोक दिया गया ?
फिर तो वह दिन दूर नहीं जब रेलमार्ग सड़कमार्ग बस्तियों और गांवों नगरों के आसपास तो कहीं खेत बाग बगीचे आदि हो ही नहीं सकेंगे । तब सोचकर हिसाब लगायें कि जिस तेजी से सड़कीकरण रेलवेकरण और नगरी करण चालू है उसके अनुपात में कितनी कृषिभूमि लीलता निगलता जा रहा है "विकास "? इस तरह के अनियोजित मूर्खतापूर्ण विकास का मूल्य कितनी कृषि भूमि को खोकर चुकाना पड़ेगा देश को और विश्व को भी ।क्योंकि यदि एक हिस्से में भी पृथ्वी के जल वन पौधे कषि है तो बहुत सारे हिस्सों तक निर्यात किया जा सकता है ।कहीं भी किसी भी देश की कृषि भूमि का विनाश पूरी पृथ्वी के लोगों के आहार और पोषण औषधि और मूलभूत जीवन आवश्यकताओं पर कटौती विनाश ही तो है । कृषक की गरीबी का उपहास आत्महत्याओं पर राजनीति और कृषि विकास के नाम पर राजनेता और प्रशासनिक कर्मचारियों का भ्रष्टाचार घोटाला यह सब तो बहुत चर्चा का विषय बनता रहा है किन्तु ऐसे उपायों पर बहुत कम प्रगति चिंतन और क्रियान्वयन होता है जिनसे कृषक को गंदा न रहने पड़े वह गरीब न रहे वह समाज की मुख्यधारा से कटा न रहे कृषि और कृषक सम्मानित हों तथा नवीन तकनीक प्राचीन ज्ञान अनुभव के सामंजस्य से सरल कार्य होता जाये कृषि । लागत कम से कम हो इसके लिये श्रमिकों की मानव श्रमों की कमी पहली आवश्यकता है जुताई, जेल्ह ,बखराई ,बुआई ,पटेला ,बर्हाई, नलाई, निराई,खरपतवार हटाई, कटनदावनी ,उसावनी ,उड़ावनी, ढुलाई, तुलाई, आढ़त, मिल, मंडी ,पुकार प्रचार ,निर्यात पैकिंग ,शीतग्रह भंडारण ,और रखरखाव में पूरी एक लंबी मानव श्रंखला लगती है जिसका सारा मूल्य किराया लागत बनकर केवल कृषक के हाथों से धनलाभ छीनता जाता है ।सार सार रूप में जो बचता है वह भी  उसकी शुद्ध आय नहीं कहा जा सकता क्योंकि बढ़ती दर से आगामी फसल के लिये पुनः पूँजी निवेश करना होता है ।डीजल के दाम दो रुपये बढ़ते हैं तो ट्रक- ट्रैक्टर वाले और इंजन आदि की लागत कई हजार रुपयों तक बढ़ा दी जाती है ।
देखा जाये तो कृषक स्वभाव से होते हैं लोग रोजगार की वजह से कम ।यानि खेती करते हैं क्योंकि खेती करने से मन का स्वाभिमान संतुष्ट रहता है । वरना क्या कारण है कि हम लोग आज सदी भर से कृषक हैं न पूर्वज कुछ खास विरासत छोड़ पाये न हम ही इन तीस चालीस वर्षों की खेती में कभी ऐसा समय आया कि कर्ज में नहीं रहे ।एक ऋण उतारते ही दूसरा हर हाल में लेना ही पड़ता है ।क्योंकि कृषि की लागत तो कई लाख रुपया है और जब आती है उपज सब निकालकर तब बचता बस कुछ सार संग्र ही है जो बारह महीने रहने खाने पहनने को भी और पुनः पुनः कई लाख लगाने को भी चाहिये होता है । इस कर्ज के चक्रव्यूह को तोड़ा कैसे जाये जब हम सोचते हैं तब ,ही सामने आता है कि यदि इतनी हिम्मत आश्वासन गारंटी होती कि लिया गया ऋण हम चुका ही लेंगे तो कुछ और अधिक कर्ज लेकर ,एक नवाचार करते मशीने लेते राईस मिल लगाते ,स्वयं का फूड प्रोसेसर पैकिंग और सेलिंग सिस्टम खड़ा करते । सहफसली चीजें बोते । बाऊण्ड्री लगाकर नीलगाय हिरण गीदड़ लोमड़ी शूकर आदि का आना रोकते ।चूहामार दवायें रखते और नयी से नयी बीज खाद तकनीकी मशीनें लगाते ।
परंतु एकमुश्त रकम घर खेत गिरवी रखे बिना देगा कौन ?ऊपर से मानसून पर ही तो सबकुछ निर्भर है ।विगत वर्ष अप्रैल और मई में दो तीन बार बरसात हो गयी हमारा तीस चालीस हजार रुपया बच गया बच्चों की साईकिलों के लिये जुगाड़ हो गया और कर्ज का ब्याज पटा दिया । इस वर्ष जून तक गन्ना बचाने को चार बार सिंचाई देनी पड़ी सब खर्च बंद हो गये और तो और रसोई में भी टीन कनस्तर डिब्बे खाली ही रह गये न कहीं आये गये क्योंकि सब तो खेत पर सींच के नाली बरहाने और इंजन धरने उठाने पाईपलाईन बिछाने समेटने में ही लगे रहे ।अब कल परसों से वर्षा प्रारंभ हुयी तो जान में जान आई ।चार साल पहले सारी धान बाढ़ में डूब गयी थी चारा पुआल तक नहीं हो पाया था । उसके पहले एसाल खड़ी बालियों पर ओले पड़ गये गेंहूँ तो दूर भूसा तक नहीं निकला । एक वर्ष इतना सूखा पड़ा ऊपर से डीजल कतार में लगकर ब्लैक तक में लेना पड़ रहा था कि 1/4खेत परती ही रह गये बिना बोये ही खरपतवार तक नहीं हुये ।भारतीय कृषि मौसम ओले बाढ़ सूखा मानसून और एक एक दिन की वर्षा की देर सवेर पर ही आज तक निर्भर है । यूरोप चीन अरब ब्राजील अमेरिका  में कृषि पर बहुत सारे उपाय लागू करके उसकी आकस्मिक हानि को कम से कम किया जा रहा है वहीं भारतीय किसान की संपूर्ण कृषि एक सट्टा एक जुआ एदाँव किसमत का हर बार हर फसल पर होती है । लग गया तो जिन्दगी नहीं तो बस बरबादी । एक वर्ष बाढ़ ओला तो दूसरे वर्ष सूखा पड़ने पर जो जो कृषक सब कुछ लागत तबाह कर चुके हैं उनसे यह पूछकर तो देखे कि उन दो बरसों में हालात कैसे थे ?न तो मजदूरों का रोका जा सकता है न डीजल खाद बीज बैंक और ढुलाई का रुपया तो किसान कर्ज नहीं लेगा क्या करेगा ?उपज खत्म होते ही बरबाद नहीं होगा तो कहां से जीयेगा परिवार कैसे खाना कपड़ा किताबें फीस चुकायेगा ?अगर अनुमान से कम हुयी उपज तो भी किसान के हाथ खाली ही रह जाते हैं । हमारे बगल की चक्की वाले का परिवार तीन मंजिला कोठी कार और अब नयी फैक्ट्री तक पहुँच गया क्योंकि उसका पूँजी निवेश बस एक बार का था प्रतिवर्ष तो केवल लाभ ही लाभ लेना था और पूँजी तो भी बढ़ती ही रहनी है । दुकान मिल व्यापार रीयल स्टेट और वाहन वालों की पूँजी बढ़ती ही तो रहती है दाम के अनुपात में लागत घटती जाती है लाभ के अनुपात में और एक दिन ऐसा आ जाता है कि लागत निकल आती है बस फिर लाभ ही लाभ होता जाता है ।किंतु कृषक की पूँजी मिट्टी से मंडी तक लगती है हर वर्ष पहले से अधिक निवेश के साथ बाजार भाव से बढ़ते क्रम में और उपज का दाम एक रुपया गिरते ही बाजार में उसका दांव हार जाता है लाभ और लागत की बारी ।बताते हैं ,सचमुच ही  हमने घर की आँगन वाली जगह खोदकर सब्जियां बोयीं बीज आया पचास रुपया पुड़िया ।कीटनाशक लगा तीन सौ रुपये का ।खाद डाली पाँच सौ की । पानी तो सब्जी में हर रोज ही लगता है पूरे दो घंटे सींच का बिल आया एक हजार रुपया महीना से तीन हजार । जब हमने बोयी थी सब्जी रेट था चालीस से साठ रुपये किलो । जब हमने बेचने भेजी तो आढ़त पर दाम गिर गये और हो गयी बीस रुपये की पाँच किलो सब्जी । यह विगत वर्ष की बात है । हमने बाजार तक भेजने की ही एक दिन की लागत नहीं निकाल पायी ,जबकि एक सब्जी तीन महीने से चार महीने के परिश्रम लागत और रखवाली से तैयार होती है । महानगर के साहब लोग दारू कोल्ड ड्रिंक कपड़ा साबुन पेस्ट क्रीम पाऊडर कंघी ब्रुश बाल्टी मग फर्नीचर रीचार्ज मोबाईल इंटरनेट बस कार रेल भाड़ा सिनेमा लग्जरी सोना चांदी स्टील तांबा पीतल का दाम हर साल सैकड़ा हजार के अनुपात से बढ़ने पर भी कुछ शोरगुल नहीं करते ना ही मुद्रा विनिमय दर पर कुछ शोर मचाते हैं परंतु टमाटर प्याज दूध आलू मिर्ची धनिया दाल गेहूँ गुड़ चावल का एक रुपया दाम भी बढ़ जाता है तो सड़कों पर उतर कर हंगामा मचा डालते हैं !!
क्या जितनी तनख्वाह उनकी बढ़ती है स्कूलों कालेजों की फीस बढ़ती डीजल पेट्रोल नमक साबुन यात्रा ढुलाई बिजली बिल और कपड़ा कागज का दाम बढ़ता है वह हम सब किसानों को नहीं भरना पड़ता ?वकील साहब की फीस पाँच सौ पाँच हजार और ट्यूशन की फीस पचास रुपये से दो हजार हो गयी परंतु सब्जी अन्न दाल अनाज दूध आज भी बीस रुपये से नीचे नीचे ही चाहिये ?कैसे होगा ?बाजार तक भेजने की भी तो एक लागत और मानव श्रम होता है ?वह वाहन भी हर साल महँगा हजारों के हिसाब से होता जाता है कैसे करें खेती और पशुपालन ?डीजल बिजली मजदूरी बीज खाद चारे खल दवाई तक की लागत ही न निकले तो कौन करेगा ?फिर काहे को रोते हो दुखड़ा कि नकली दूध मावा दही मिल्क पाऊडर घी मख्खन और मिलावटी दाल तेल मसाले आ रहे हैं बाजार में ?व्यापारी बाजार में बैठा है वह रोज दाम का रेट जानता है ,किसान तो गांव से भी और इंटीरियर भीतरी जंगलों में जाकर खेती करके फसल और चारा लाता है उसके पास कहां तो समय है और कहाँ संसाधन कि समझे बाजार की तिकड़में चालाकियाँ और भाव दर सौदेबाजी लाभ के आँकड़े ?इसीलिये किसान सदी भर की हाड़तोड़ लगातार बारहों महीने बिना नागा बिना पारिश्रमिक लिये किये गये श्रम और कर्ज ले ले कर लगायी गयी हर साल की पूँजी के दाँव ईमानदार सप्लाई के बाद भी गरीब गंदा उपेक्षित बदहाल रह जाता है और बिचौलिये व्यापारी हर साल पहले से भी और धनवान सरकारी कर्मचारी पहले से भी और संपन्न होते चले जाते हैं ।श्रमिक तक दस साल बाद मालिक बन जाता है वाहन दुकान सामानों का परंतु कृषक फिर मौसम कीड़ो मानसून बाजार भाव लागत और सरकारी दाब धौंस दलालों की साजिशों के बीच किसमत की बाजी पर बरबादी या पुनर्जीवन का जुआ लगाकर आशा करता रह जाता है मैला पसीने से तरबतर गंदा बदसूरत और उपेक्षित।
©®सु

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