Monday, 3 July 2017

​धरती का ऋण कुछ तो हों उऋण - ​पिलखन ,पाकड़ ,पाकर, प्रकर

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धरती का ऋण कुछ तो हों उऋण
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वर्षोत्सव मनायें चलों फलदार उपयोगी वृक्ष लगायें
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आज का वृक्ष
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पिलखन ,पाकड़ ,पाकर, प्रकर ,
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पाकड़ या पिलखन एक विलक्षण वृक्ष है यह बहुत शीघ्र और बहुत कम देखभाल से पनपने वाला वृक्ष है । एक पिलखन की बड़ी सी मोटी डाल हरी भरी काटकर वर्षा या शरद ऋतु में कहीं भी नमी वाली मिट्टी में गाढ़ दें जिसकी लंबाई पांच से दस फीट तक भी हो सकती है ।वह डाल मात्र एक साल की ही देखभाल से भरा पूरा वृक्ष बनना प्रारंभ हो जाती है ।एक बार जड़ पकड़ लें तो पिलखन के पेड़ बहुत जल्दी बड़े होते हैं जो पैतींस से पैंतालीस फीट तक भी ऊँचे हो सकते हैं । इसकी छाया बहुत घनी ताजगी भरी शीतल होती है ।इतनी सघन कि मूसलाधार वर्षा से भी बहुत हद तक बचा जा सकता है । टीन शेड वाले यात्री विश्राम गृह के स्थान पर यदि पिलखन ही सरकार प्रत्येक बस स्टैणड रेलवे स्टेशन आॅटो रिक्शा स्टैण्ड और प्रतीक्षास्थलों पर लगवा दे तो सौ से तीन सौ साल तक वहां घनी छाया बनी रहेगी । इस के पत्ते कोंपलें होने पर अचार में और कुछ थाई व्यंजनों में थाई मसाले की भाँति डाले जाते हैं । यह बरगद की प्रजाति का ही वृक्ष है । कहते हैं कि पिलखन के नीचे जाप और ध्यान करने से सिद्धि मिलती है और मनोकामना पूर्ण करने हेतु प्रार्थनायें सफल होतीं हैं इसे कुछ संत महात्माओं ने कल्पवृक्ष कहा है । पिलखन के फल पीले और अंजीर जैसे ही बीजों से भरे खटमिट्ठे स्वाद के होते हैं । जिनको अचार और मदिरा बनाने में भी प्रयोग किया जाता है । पत्तलें दोने बनाने के लिये मशीनों से पिलखन के पत्ते बहुत उपयोग में लाये जाते हैं । बकरी आदि के लिये इसके पत्ते उत्तम आहार हैं । लकड़ी भी पर्याप्त मजबूत निकलती है । आवश्यकता है कि आज यथा संभव चौराहे दो राहे तिराहे और बाजार मंदिर श्मशान कब्रिस्तान थाने कचहरी न्यायालय तहसील स्कूल और अस्पताल सड़कों के बड़े डिवाईडर और खेतों के चौड़े मैदानों के आसपास नदी तालाब झील सरोवर और तीर्थों के आसपास अधिक से अधिक छायादार फलदार उपयोगी वृक्ष लगायें ।यह वृक्ष चिड़ियों को बहुत भाता है वे इसके फल खाकर दूर दूर तक बीज फैला देती हैं । एक पिलखन कहीं लग जाये तो आसपास की बहुत सारी मिट्टी वाली नम जमीनों पर अनेक पौधे बरसात के बाद दिखने लगते हैं । यह खंडहरों और पुरानी इमाारतों की दरारों में भी पनप जाता है ।
तो चलो एक माह में एक ही सही हम भी एक वृक्ष लगायें धरती का कुछ तो ऋण चुकायें ।

पाकड़ या
पिलखन एक बरगद प्रजाति का पेड़ हैं वैसी ही सूत्र जड़े भी होती हैं बड़े पत्ते भी परंतु इसकी मोटी सी शाखा काटकर गाड़ दो तो पेड़ चल पड़ता है और कुछ ही बरस में बड़ा घना और कम देखभाल में पल जाता है ,सड़क किनारे गांव और चौपाल मंदिर और मजार हर जगह एक पिलखन लगाते रहो, घनी छाया जहां जहां चाहिये ,पूरी छतरी सघन रहती है जबकि देख ये रहे हैं कि काॅलेज और सरकारें दिखावटी सजावटी पौधों पर लाखों रूपया खर्च कर रहीं हैं जो बहुत सींच और रखवाली से पनपते हैं छोटे रह जाने से न छाया न फल न ही कुछ अधिक प्राणवायु
पाकड़ कल्पवृक्ष है ऐसा एक संतयोगी ने भी कहा।
पाकड़ शीघ्र बड़ा होता है एक पूरी पान की गुमटी हमने पाकड़ के तने में धँसी देखी घनी छाया इतनी कि टीन के ये यात्रीशेड बकवास ,
पश्चिमी यूपी में पहले सब जगह पिलखन थे
एक दसफीट की शाख काटकर नमी में गाड़ देते पाँच साल में घना पेड़ हो जाता ,
अब सरकारी रकम डकारू वृक्षारोपण हो रहा है दस पांच फुटिया रह रह जाते पेड़ों का
 
प्लास्टिक के ताड़ लगने लगे
पाकड़ कल्पवृक्ष है ऐसा एक संतयोगी ने भी कहा
 पाकड़ की कोंपलों का अचार बड़ा स्वादिष्ट बनता है।
पाकड़ की पत्तियां थाई करी में डालीं जातीं हैं
और नन्हें फल जो अंजीर जैसे दिखते हैं खाये जाते हैं
यह पच्चीस से पैंतीस मीटर तक भी ऊँचा हो सकता है
इसे कलम से लगा सकते हैं बरसात की नम जमीन पर कहीं भी
चार पाँच फीट की मोटी डाल काटकर गाड़ दें बस हो गया चार पाँच साल में महावृक्ष तैयार
इधर दिल्ली से देहरादून तक बहुत हैं उधर दक्षिण में भी हैं
सब तरह की जलवायु में पनपता है रिगिस्तान तक में लग सकता है बशर्ते वयस्क हो लेने तक जल मिल जाये इसीलिये लोग बरसात का पहला छींटा बरसते ही शाखा काटकर लंबी सी दस फीट तक की गाड़ देते हैं और एक साल तक देखभाल करके बड़ा पेड़ बना लेते हैं

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