Friday, 14 July 2017

सवर्ण कहकर दमन कब तक ?कब तक तिरस्कार ?--(सुधा राजे)

सवर्ण कहकर दमन कब तक ?कब तक तिरस्कार ?
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••(सुधा राजे)

राजपूत जाट और सिख योद्धा कौम है ।देश के हर नागरिक अनागरिक पर इनका लहू कर्ज है ।
 आजाद हिंदुस्तान के लिये त्याग के नाम पर राजपूतों से रियासतों का विलय करवाया गया और गणतंत्र की स्थापना के लिये जागीरों की भूमि भूदान में ले ली गयी ,काॅग्रेस की निजी खुन्नस के चलते सैकड़ों सहयोगियों का आश्रय बने राजाओं के प्रिवीपर्स बंद कराये गये और किलों महलों हवेलियों गढ़ी टाॅकीजों  जेलों फार्महाऊसों राजकीय स्कूलों काॅलेजों अस्पतालों क्लबों और राजकीय मंदिरों धर्मशालाओं को अधिग्रहीत करके म्यूजियम दफ्तर सरकारी आवास और तमाश घर बना दिये ।
फिर आरक्षण की चक्की में उनकी संतानें पिसतीं रहीं और नालायक अयोग्य लोग ठेल ठेल कर ऊपर चढ़ाये जाते रहे ।
हर जगह मामूली सी बात पर उनको अपमानित प्रताड़ित और उपेक्षित किया गया । स्वभाव से स्वाभिमानी लोग यह तिरस्कार पी पी कर जैसे तैसे देश मेरा है कहकर स्वयं को समझाते रहे तो उनके बीच उभरते हर दृढ़ और शक्तिशाली नायक को कुचलने की पूरी साजिशें रचीं गयीं जिसका नतीजा बगावत ही होता है और इसी कारण आज सिख जाट राजपूत तीनों ही स्वयं को देश के नाम पर ठगा हुआ महसूस करते हैं । अस्त्र शस्त्र और शत्रु को जीतकर अन्याय से लड़कर कमजोर की रक्षा करने वाली कौम अपने पुरखों के नाम पर मजाक उपहास फिल्मी झूठे चरित्र कब तक सहती इससे साबित किया जा रहा था कि जाट गंवार ,सिख मूर्ख और राजपूत अत्याचारी होते हैं । देश को बांधकर रखने की ताकत प्रशिक्षण से नहीं आती है प्रकृति ही देती है किसी को बुद्धि किसी को साहस और बलिदान अब यदि उसको दबाया कुचला जायेगा तो वह विस्फोट करेगा ही । दमन से रुकने वाली कौम न तो सिख जाट हैं न ही राजपूत । बुन्देलखंड पूर्वांचल हरियाणा गुजरात और अब राजस्थान ???????कौन है मिसट्रीटमेंट का शिकार स्पष्ट करें । जातीय रोजी रोजी छीनकर दूसरों की रक्षा का ही इतिहास विकृत करके फिर आरक्षण में आजाद हिंदुस्तान उनको  वापस जा सौंपा जिनके पुरखे ही आतताई रहे तब असंतोष न आये तो क्या हो ????हर राजपूत सिख जाट एक असंतोष से भरा है । प्रतिभाओं के दमन और सरकार की भेदकारी राजनीति साफ समझ में आती है । राजस्थान में आज जो हो रहा है वह एक तरफ तो फिल्मी नौटंकीबाज इतिहास बदलने की साजिशें कर रहे हैं कुंठित लोगों की शह पर ।दूसरी ओर सरकार सुनवाई की बजाय दमनचक्र चला रही है !!!!!!
अब ????????
इस संताप का फल कौन भुगतेगा ??
सत्ता के मद में बलिवीरों के वंशज कब तक दबाये जा सकेंगे ????
राज्य सरकार का नशा कहीं केंद्र सरकार को भारी न पड़ जाये ???
मध्यप्रदेश राजस्थान गुजरात की उपेक्षा और बंगाल कशमीर की खबरें ,
अशांत हृदय को क्या सांत्वना दे सकतीं हैं ,

ऐसी सैकड़ों कहानियां है जब भटक गये कम्युनिटी वारियर कानून से ही टकरा बैठे परंतु बाद में समझाने समझने से सरेण्डर करके सामान्य प्रायश्चित्त के बाद नागरिक बन रहे ।
मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने सैकड़ों डाकुओं तक के आत्मसमर्पण करवाये ।फूलन ,मलखान ,तक के ।
क्या सीबीआई जांच नहीं करायी जा सकती थी ?राजस्थान मामले की ??क्यों ??क्या सच तो नहीं राजपूतों का आरोप कि सरेंडर करने जा रहे आनंद पाल को जानबूझकर मारा गया ??और अब ??इस दमन का परिणाम और नये बागी !!!!!!
केंद्र और मीडिया सब सोते रहे ?
सिख ने धर्म बदल लिया और विदेशों में उनको ताकत मिली कनाडा अमेरिका इंगलैंड तक ,
भारतीय जाट कृषि उर्वर हरियाणा और यूपी के कारण पनप गये ।
किंतु राजपूत सूखे गुजरात सूखे मध्यप्रदेश सूखे मारवाड़ मेवाड़ में कृषि की सबसे खराब स्थिति वाले कृषक मजदूर रह गये ।
और टेलीविजन फिल्म वाले प्रारंभ से ही एक जेहाद राजपूतों के खिलाफ चलाये जा रहे हैं जिनमें जमकर ठाकुर बलात्कार करते हैं राजपूत औरतें बदचलन आवारा नाजायज बच्चों की मां बनती है राजपूत लड़कियां घर से दलित अल्पसंख्यक प्रेमी के साथ भाग जाती है वह दलित अल्पसंख्यक प्रेमी बाद में समूचे ठाकुर खानदान को तबाह कर डालता है ।
यहाँ 
यह याद रखने वाली बात है कि ठाकुर साब का बनिया मुनीम गद्दार होता है और 
पंडित पुजारी लालची ...
किसी भी फिल्म में न तो कोई जोजफ खराब होता है न ही कादिर।
जब राजपाट बरबाद हुये तब अंग्रेज नहीं मुगल थे ,बचा खुचा बरबाद बागी घरानों को अंग्रेजों और गद्दार नवाबों ने कर डाला ,रही सही कसर भूमिअधिग्रहण भूदान और जमीन्दारी उन्मूलन से हो गयी ,
जब बच ही गये तो सोचा कि चलो नौकरी करें हुनर से कमा खा कर आम साधारण प्रजा बनकर ही जी लें ,
तो ताने तिरस्कार दुत्कार उपेक्षा बच्चों को मिली कि ""तुम तो राजपूत हो ब्राह्मण हो ,सवर्ण हो ""
तब भी सोच लिया कि चलो सामाजिक समरसता के लिये यह सब ठीक है ,
तो सब हमारे ही अपने हैं न क्या जाति क्या धर्म ,
तब 
आरक्षण का जुआ कंधों पर धरकर ,
बैल बनाकर कह दिया घूमते रहो 
कुछ भी कर लो कहीं नहीं पहुँचोगे अब ,
जो कुछ भी है सब केवल 
आरक्षित लोगों का है ,
तुम सब के सब सवर्ण केवल ,
आयकर बिक्रीकर भवन कर जलकर बिजलीकर भूमिकर पथकर पूजाकर अन्नकर वस्त्रकर भरो ,
और 
तुम किसी भी हुनर या योग्यता के माहिर हो जाओ गरीबी से लड़कर भी तो भी ,
ऊपर चढ़ते समय ,
सवर्ण कहकर राजपूत ब्राह्मण बनिया कायस्थ कहकर नीचे धकेलते ही रहेंगे ।
एक और साजिश चला दी कि ,
,
तुम्हारा मुख करिया करने को वंश इतिहास पुरखों सबको कलंकित करते रहेंगे ।
,
कांग्रेसी नेता  पांच औरतों से बिना विवाह के रिश्ते रख सकता है बुढ़ापे में भी परंतु युगानुसार राजा संधि और समय की मांग के हिसाब से पांच विवाह करके कलंकित बताया जाता है ।
आज तक कोई ऐसी फिल्म या टीवी सीरियल नहीं मिला जिसने ऐसा षडयंत्र न किया हो । डाकू ठाकुर ,
जबकि समय बताता है कि गड़रिया ढीमर मल्लाह गूजर कुरमी सब जातियों से अपराधी डाकू रहे हैं ।
लालची लिप्सावाला वासना का कीड़ा होगा ""लाला ""और .......नीच से घृणा करके गद्दार होगा पुजारी ,,
,
,
जाति केवल संबोधन के लिये या लोकगीत में आयी हुयी है तो फिल्म के टाईटिल और गीत के बोल बदलने पड़ जाते हैं वहीं ,
सवर्णों के गोत्र चौहान राठौड़ पांडे शुक्ला सूर्यवंशी तक कहकर फिल्म में बुरा बता दिया जाता है ।
चुनौती है कि सत्यकथा खोजकर साबित करें सब ।
वरना तो यह तय है कि सवर्णों को अब जातिसूचक शब्द पर बैन लगाने के लिये सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ेगा ।
कला के नाम पर ,
छल नहीं चलेगा।
सिखों का सम्मान ,
भारतीय नहीं करते किंतु कनाडा में उनकी इज्जत है । पंजाब की सीमा के प्रहरी सिख ,न होते तो देश का आधा नहीं पूरा पंजाब चला गया होता । 
राजस्थान यदि प्राचीर न बनता तो नक्शा दिल्ली तक ही सिकुड़ गया होता ।
सेना में सवर्ण सबसे अधिक मरते आ रहे हैं देश के लिये 1947से अब तक का इतिहास उठायें तो सच सामने आये । या तो हर जगह से हर तरह से सरकारी स्तर पर जातिवाद को खत्म कर दिया जाता ।
न स्कूल अस्पताल काॅलेज जनगणना परिचय पत्र कहीं पर जाति मजहब पूछते न ही जाति के आधार पर नौकरी वजीफे विवाहअनुदान और सहूलियते दीं जातीं ।
या फिर इतना अन्याय न होने देते कि जिनकी मातायें घरों में बाजरा पीसकर बच्चे को वीरता सिखती रहीं और देश के लिये सुहाग भेजतीं रहीं ,
वे बलिवीरों की संतान होकर दबाये अपमानित किये और तिरस्कृत किये जाते ।
एक तमाशे में नारेबाज किसी ने मां बाप के जेल जाते समय अंग्रेजी जेल हो आये तो आज तक ,
****स्वतंत्रता संग्राम सेनानी *****कहकर पेंशन पाये जा रहे हैं !!!!!!!!

एक पूरी कौम पीढ़ी दर पीढ़ी देर के दुश्मनों से लड़ती रही बरबाद घरों से निकलकर भी देश आबाद करती रही उसको एक सामाजिक स्वीकृति तक नहीं ??????
ये 
किसकी साजिशें है??
केवल भारत के द्रोही नमकहराम और मतलबी सियासती कंसों की जो नहीं चाहते कि लोग देशभक्त हों । वीर हों और राजपूत सिख जाट ब्राह्मण की तरह कट्टर भारतीय हो।
गुर्जर प्रतिहार जो राजपूत ही थे उनमें भी भेदभाव डाले गये ,
और ,
युद्ध से घर लौटे वीर सूखी रूखी खाकर टूटी फूटी खंडहर हवेली में देशगीत गाते रह गये।
जबसे सिखों में धर्मपरिवर्तन कराने और संख्या बढ़ाने की होड़ लगी है तबसे ही "
""नशा आलस वीरत्व ह्रास विलासिता और देश के प्रति अनिष्ठा वाले गुट भी बनते गये ""।
बंदा बैरागी भी राजपूत लक्ष्मण सिंह ही तो थे।
महावीर और पद्मनाभ ने सुधार किये जैन पंथ चलाया ,
सिद्धार्थ ने सुधार किये बौद्ध पंथ चलाया 
रणजीत सिंह ने सुधार किये सिख पंथ चलाया ,
राजपूत 
कभी जातिवादी नहीं रहे ,
राष्ट्रवादी अवश्य रहे ।
और यही उनका गुनाह रहा जिसके लिये राम से लेकर ,
राजू तक सबको आज सरकारी पिट्ठू  राजनीतिक सामाजिक जनसांचारिक षडयंत्र से नष्ट करना चाहते हैं ।
वीर होना अभिशाप हो जायेगा तो क्या ,
कविताओं के पुलंदे मारे जायेंगे दुश्मन को ?
फिर 
ताना क्यों क्षत्रियत्व का ।
आज तक क्ष से क्षत्रिय पढ़ने पर विवश बालक को दूसरा उचित शब्द तक तो मिला नहीं।
पुराने पन्नों में बहुत कुछ जलाया गया परंतु लिखित ही तो सब नहीं अभ्यास भी है गढ़वाल में सूर्यवंशी परमार सब तरह के ठाकुर हैं जो आज तक देश पर पहली कतार के सिपाही हैं।
ब्राह्मण बुद्धि की संतान रहे उनका दमन ब्राह्मणवाद कहकर केवल इसीलिये किया जाता रहा कि वे यदि बढ़ गये तो लहू पसीने में तरबतर जाट सिख राजपूत कहीं उसकी बातें सुनकर पढ़ लिखकर आगे बढ़कर देश को न सँभाल लें।
सारा राज्यव्यय सारे कर सारे टैक्स कौन भरता है ??क्योंकि बाकी तो कर मुक्त है ?
और उलटे पूर्वजों की बनायी निशानियां मिटाकर नये नये टुच्चे पीएडी लोग नकली डिगरी में सबका इतिहास तक बदले जा रहे है ।
राजपूतों का इतिहास भारत का सच पढ़ना हो तो ,
कर्नल टाड 
जेम्स स्लीमन ,
और विदेशी प्राचीन शोध देखनी होंगी ।
देश के मीडिया ने सबका सब वास्तु मुगलई घोषित कर डाला ।
कैसे एक गर्म लहू का वंशज इतना दबेगा ?
ब्राह्मणों को राजपूतों का साथी होने की बजाय शत्रु कहकर खड़ा करना भी एक साजिश ही रही जहां """शेख बरहमन """पादरी कहकर पुजारी लोग अलग कर दो योद्धा तो लड़ने से जब होश मिलेगा तब जानेगा हुआ कहां क्या । जिसका शिकार नयी घृणित राजनीति आयी और दलित को समझाया गया कि ब्राह्मणों की वजह से तुम सब गरीब हो ,जबकि ,
ब्राह्मण का था ही क्या !!!
राजपूत मंदिर बनवाले ब्राह्मण पुजारी दान की जमीन पर पूजा पाठ से जीता ।
पढ़ाता रहा ।
कर्मकार तो हर व्यवसाय का लोहा ,कपड़ा चमड़ा ,तांबा, पीतल, सोना, मिट्टी, पानी, गौधन, पर ही बंटकर परंपरागत रोजी रोटी कमा खा रहा था ।
ये रोजियां किसने छीनी ?????
वे 
लोग जो उन चीजों के लुटेरे थे ,
वे
आक्रमणकारी साम्राज्यवादी लोग जो उन चीजों को खुद बनाकर बेचना चाहते थे ,
,
न तो राजपूत ने ,
न ही ,
ब्राह्मण ने ,
,
किसी भी रोजी नहीं छीनी ,
गरीब कौन ??
बेरोजगार और कौन !!!!
,
,
याचक कौन ??
बेरोजगार ,
,
तो बजाय रोजी रोटी निर्विघ्न कमाते हुये लुटेरे से छीनी गयी रोजी की बात समझे ,
,
दिमाग में ठूँसकर बैठ गये लोग कि ,
लोहा पीटना बुरा काम है ,
लकड़ी का सामान बनाना बुरा काम है ,
,
,
तकनीक और दिमाग के बल पर जिस भारत की संपन्नता की कहानियां सुनकर लोग भागे आ रहे थे ,
,
वे ही ,
पूजे जाने लगे ,और कारण बताया गया गरीबी का पंडित जी को सिपाही को ?




©®सुधा राजे

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