कविता, अरे बावले क्यों रोता है

प्रखर प्रबल मार्तंड उदय घन तिमिर त्वरण में से होता है
दारुण दुख के बाद व्यक्ति का उदय स्वयम  में से होता है ,
अरे बावले क्यों रोता है,
अरे बावले क्यों रोता है! !
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1**चलो चलो चल पड़ो न रुकना लक्ष्य जरा बस तनिक दूर है 
भय अवसाद निराशा दुख पर तुझे   विजय पाना जरूर है

पथ के सारे घाव यात्रियों के उपहास भुलाता चल
दौड़ ना सके तो अंगुल-अंगुल भर पद खिसकाता चल

पीर प्रसव की सोच सृष्टि का जन्म रुदन में से होता है
अरे बावले क्यों रोता है! !
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2**बस निन्दा उपहास व्यंग्य से विचलित भ्रमित पलायित क्रंदन!   !
प्राणिमात्र अस्तित्व सबल का संघर्षित आशायित वन्दन

गर्भवरण से देहमरण तक रो हँस गा बहलाता चल
किंचित भर मुस्कान बचे ना तो भी गा बतियाता चल

नए वृक्ष का जन्म जीर्ण के पतन मरण में से होता है
अरे बावले क्यों रोता है! !
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3**धिक्! लोकोपवाद की चिंता, धन पद न चल

अनल विहग का जन्म स्वयं की भस्म दहन में से होता है
अरे बावले क्यों रोता है !!!
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4**हार कहाँ ये बस प्रयास था  करो अभी अभ्यास निरंतर
ये प्रयत्न कुछ कम था फिर से बढ़े विजय की तृषा भयंकर

करो वार पर वार वार पर वार प्रहार बढ़ाता चल
चूर चूर लथ पथ हो श्रम से बाण प्रगाढ़ चढ़ाता  चल

ध्वनिभेदी शर बहुत गहन अभ्यास परम में से होता है
अरे बावले क्यों रोता है !!
©®सुधा राजे
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षड्ज ऋषभ गान्धार मध्यम पंचम धैवत निषाद









©®सुधा राजे
धरम परम हरम मरम करम चरम नरम भरम शरम

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