Sunday, 31 March 2019

गजल: बहुत खुशहाल लोगों से जरा सी दूरियाँ अच्छीं

बहुत उजले मकानों में रहे लोगों से क्या शिक़वा
वो कोयले की खदानों से निकलना कैसे समझेंगे
.........वो दिल का टूटना दुनियाँ का जलना.....कैसे समझेंगे
,
बहुत खुशहाल लोगों से जरा सा दूरियाँ अच्छीं
बिना नाखूं जलाए ज़िस्म जलना कैसे समझेंगे
©®™सुधा राजे

कविता: :अनधी हुयी सियासत गंदी

Sudha Raje
Mar 9 ·
गूँज रहीं हैं अंतरिक्ष तक चीखें
जलती रूहों की
धधक रही बिन मौत चितायें
कैसा देश????
कहाँ का न्याय????

देश?? कि जिसमें अब तक
आधी आबादी  बेघर!दर दर!!!!!
न्याय कि जिसमें भक्षक बचते
पीङित के ही दबते स्वर?????
कौन प्रशासन??? अरे
वही तो नोंच रहा है
कपिला गाय!!!!!
कौन बचाये किसे बुलाये

अंधी हुयी सियासत गंदी
गाँधीवाद बेचते धंधी
धूल धूसरित विधि विधान सब
वोट चुनाव कमाई की अँधी
जाति धर्म और लिंगभेद दमखम
सत्ता का पर्याय
मात्र कुरसियाँ रहे बचाये
नेता अभनेता कविराय
कैसा देश कहाँ का न्याय
©®¶©®¶
Sudha Raje
बच्चे भूखे खोज रहे कूङे नें जूठन बिकती माँ
और दूसरी ओर केक भी फेंक के होली का मज़मां
दिन भर चलकर चार घङे पानी लाती महिमा सलमा
घर में झील बनाकर तैरे दूजी ओर रमा शम्मां
लाज नहीँ छुपती पैबंदो से भी हवस रोज भरमाये
धन ले बदन दिखा इठलाये
घोर गरीबी लुटती जाये©®सुधा राजे

गीत: ::दिन ढल रहा

Sudha Raje
ढल रहा, ,,,दिन ढल रहा । फिर
अंततः दिन ढल रहा """"""""
द्रुम-शिखर रवि रश्मियाँ रव
नृत्य कुंजन खग निकर ।

जांगुलिक उर बीन फूँके मत्त
विरहा फणि मुखर।

जलधिगा जल अर्क जल आवर्त मन
क्षिति छोर पर ।

मिल अरूण चलता बिछुङता इंदु
लोचन मल रहा

ढल रहा दिन ढल रहा फिर
अंततः दिन ढल रहा
©®¶©®¶Sudha Raje
Dta/Bjnr
साँवली संध्या अचंञ्चल दीप उडुगन
सीँचकर ।

धेनुवत्सों जननि शिशुओं
के मिलन हृद भींच कर ।

शांति वाचन देवनिलयारार्तिक
दृग मींचकर

सुमिर साधन ब्रह्म आराधन
गगन जल-थल रहा

ढल रहा दिन ढल रहा फिर
अंततः दिन ढल रहा ।
©®¶©®¶
Sudha Raje
Sudha Raje
झाँकते अवगुण्ठनों से
नयन आकुल पंथ पर ।

प्रिय प्रतीक्षा मिलन
इच्छा दर्श तृष्णा कंत हर ।

नवयुगल लेते वचन लुक--
--छिप प्रणय हृत्ग्रंथ पर

सुप्त कंजों में भ्रमर दृगबिंब
प्रियतम पल रहा
©®¶©®
Sudha Raje

उपन्यास: एक अधूरी गाथा"सुमेधा"

Sharafat: A long story
कहानी : शराफ़त भाग 8
31-4-2013
****-
सुमेधा एकटक शेखर को देख रही थी । परंतु वह देख रहा था सुर्ख आँखें  हल्के लाल हो उठे कान नाक सूजा चेहरा और बिखरे घुँघराले बाल ।उसका मन दुखा कितना मासूम चेहरा ये आँसुओं से नहाया क्यों हैं । फिर सँभल कर बोला
-अंदर आने को नहीं कहेंगी!!??
बिना नजर उठाये सुमेधा ने बैठने का इशारा किया औऱ कमरे यह कहती हुयी बाहर निकल गयी कि पाँच मिनट में आती हूँ ।
शेखर देख रहा था कमरे में इनडोर प्लांट हर तरफ महीन सफेद औऱ पर्पल रंग के पर्दे और सारा कमरा बहुत कम सामान बस जरूरत की चीज़ें । कुछ पेंटिंग्स आधी अधूरी । डस्ट बिन में तमाम कागज और टेबल पर राईटिंग पैड पर कुछ फङफङाते पन्ने । यूँ उसने उठाया देखा एक अधूरा गीत था
---देख थके फिर नयना मेरे फिर से टूटा ये मन । आ भी जा  ओ!!!  निर्मम

शेखर ने कुछ और कवितायें पढ़ी । ओह ये लङकी जितनी टफ दिखती है उतनी है नहीँ । जैसे अंदर से पिघलती लावे सी दर्द की नदी और बाहर कठोर ग्रेनाईट । शेखर के हाथ से कागज गिर पङे । उसने एक छोर पकङ लिया था मन का । एक बेचैनी सी हलचल सी दिमाग में पर क्या । ये लङकी इतना कम बोलती है कुछ पूछूँ तो कहीँ रूठ न जाये ।
सुमेधा के आने की आहट पर उसने कागज रख दिये । वह कॉफी और बिस्किट्स के साथ कुछ भुने हुये मेवे लायी थी ।
--चलिये आपको अपना टेरेस गार्डेन दिखायें ।
कहते हुये मग उठाये वह कमरे के बगल से लगी सीढ़ियाँ चढ़ने लगी ।
---इतनी वैरायटी के कैक्टस???
वाओ!!! होंठ गोल करके सीटी बजाते वह रूक गया । सुमेधा को हँसी आते आते रह गयी ।
--सॉरी पुरानी आदत है । झेंपता हुआ शेखर देख रहा था सूजी हुयी लाल पलकों पर झाँकती मुसकान कैक्टस पर फूल जैसी लग रही थी । उसने मन में कहा धत् ये क्या मैं भी कविता!!!!
उस शाम छत पर हरे टीन शेड के नीचे इजी चेयर पर बैठे शेखर केवल एक ही कोशिश कर रहा था किसी तरह सुमेधा को हँसा दे । और अंत वह हँस दी जब उसने अपनी गुंडागीरी के किस्से सुनाते हुये बताया कि वह लङकियों से आज भी घबरा जाता है ।
नीचे आते समय रात होने लगी थी ।किताबों का बंडल टेबल पर रखा था जिस पर लिखा था fOR SUMEDHA   SINGH  
BY
SHASHI SHEKHAR 
इतनी सारी मँहगी किताबें!!!
शेखर बात काटकर बोला
हमारी दोस्ती का तोहफा तुम्हें इंगलिश पोयट्री पसंद है सोचा अपने किस काम की । किताबों का भला हो जायेगा ।
वह बोलता ही रह गया जबकि सुमेधा किताबें उलटने पलटने में लगी थी ।
---मैं चलता हूँ
ओह हाँ मैं कल से दुर्गावती होस्टल में शिफ्ट हो रही हूँ तुम चाहो तो मिल सकते हो ये रहा वहाँ का नंबर ।
सुमेधा ने लिखकर नंबर थमा दिया ।
शेखर को लगा सुमेधा जैसे इस घर में ही नहीँ पूरी दुनियाँ में तन्हा है ।
सुमेधा!!!  एक रिक्वेस्ट करूँ???
हाँ बोलो!!
आज से अगले संडे तक कुछ लिखो तो मुझे पढ़ने दोगी??
क्यों??
चाहते हो पढ़ना???
वही पुरूष उत्सुकता???
क्या करोगे जानकर मेरे दिमाग में क्या है???  नहीं कभी नहीँ ।
ओके बाबा सॉरी मैं पत्रिकायें पढ़ लूँगा । शेखर ने सचमुच कान पकङे तो सुमेधा का हाथ चपत की मुद्रा में उठा और मुट्ठी भींचकर रह गयी । शेखर को लगा पसली में बाँयी तरफ कुछ जोर से धङका वह बिना रुके चल दिया ।उस रात यूँ ही घंटों ड्राईव करता । सुमेधा को क्या दर्द खाये जा रहा है?? इतनी सुंदर जहीन बहादुर धनवान लङकी को क्या परेशानी है । लगता है कहीँ कुछ है जो उसे सबसे अलग बनाता है । सोफिस्टिकेटेड नेचर या एक सरद उदासी????
सुमेधा किताबें पढ़ते पढ़ते सो गयी लगभग आधी रात को तेज प्यास से गला सूखा तो उठी और कैम्पर से पानी पिया ।  वह पसीने से तर थी शायद कूलर बंद हो गया था । लेकिन कूलर चल रहा था मन में कुछ उबल रहा था । सपना ही ऐसा देखा था । ये क्या बकवास है तो ये है सुमेधा तेरे मन में उसने अपनी शक्ल आईने में देखी लगा पीछे शेखर मुस्कुरा रहा है । उसकी नजर माँ की तसवीर पर पङी । उसने तसवीर का मुँह दीवार की ओर फेर दिया । वह सिर्फ कॉलेट मेट है और कुछ नही सिर झटक कर वह सोने की कोशिश करने लगी । नींद नहीं आयी तो लिखने बैठ गयी ।
हाथ तेजी से अक्षरों पर फिसल रहे थे और दिमाग में वही मुसकुराता धुँयें के छल्लों के पीछे छिपता गोरा गुलाबी चेहरा नीली आँखें ।
©®¶©®¶
Ek lammbi kahani
शेष फिर
Sudha Rajeन

Saturday, 30 March 2019

दोहे: सुधा दोहावली


रण खेती रजपूत की,
समर मरण सुख सेज
कहाँ जीव  सुख स्वारथी

"कहाँ  "शूर कौ तेज !!!
©®सुधा राजे

गज़ल":आँसू और बरसात

Sudha Raje
Sudha Raje
कल जमकर बरसात
हुयी थी मौसम आज
रँगीला है।
शाम चाँद बादल में सोया
सूरज पीला पीला है

जलता है चंदा की खुशी से
आफ़ताब
तन्हा आशिक़
धरती से मिलता है उफ़ुक पै
शफ़क शफ़क शरमीला है

कभी कभी तो लगता है ये
मौसम है कोई दीवाना
कभी हँसे तो फूल फूल फिर
रो रो सावन गीला है ।

मस्ती मैं अल्हङ
सी जवानी आते जंगल जंगल है
इश्क़ में पंछी पंछी गाये
मस्त बसंत नशीला है

सरदी में धरती को बरफ
सी हिज्र
में रूठी धूप दुल्हन
सूरज परदेशी साजन
सा तन्हा तनमन ढीला है

हल्का एक
ग़ुलाबी जाङा आशिक़
दिन माशूक़ सुबह
गंदुम बोये धान कटी जब हर ज़र्रा नखरीला है

तेज धूप में जलती जलती लूँयेँ विरहन
की साँसें
छाँव घनी चिट्ठी साजन
की अक़्श ताल चमकीला है

गीतों में
बहलाती सुबहों शाम चहक
डाली डाली
रोयी ओढ़ तारों की चादर
बहके समां पनीला है

खोज़े तन्हा पंछी साथी हंस मोर बावर बुलबुल
दूब दूब सी हसरत मचले
राहे वफ़ा पथरीला है

मिलन
बहारों गुंचा गुंचा खिले
फूल पर समर समर
बिछुङे सुधा ख़िज्र
सी आँधी तूफां रेत
हठीला है ।
©®¶¶®¶
Sudha Raje

उपन्यास: एक अधूरी गाथा"सुमेधा"

कहानी
****शराफ़त*****
भाग5
सुमेधा ने क्रॉस लिस्ट पर नजर दौङायी । उसका नाम कहीं नहीं था ।वह धैर्य पूर्वक एक एक नाम देख रही थी ।
--क्या मैं फेल हो गयी??? लेकिन मेरे तो सभी पेपर्स बहुत अच्छे गये थे!!!! यहाँ तक कि एक्सीडेंट वाले दिन का पेपर भी एक प्रश्न छूट गया था परंतु फेल तो उसमें भी नहीँ होना था ।

वह सोचती हुयी प्रिंसिपल ऑफिस में पहुँच गयी ।
---आओ आओ! बेटे!! कैसी सेहत है अब? 
अब भी उसके हाथ में वॉकिंग स्टिक थी ।
--वैल सर हमारा नाम नहीँ है क्रॉस लिस्ट में!!!!!
--ओह अच्छा!  बेटे वो आपका माईग्रेशन सर्टिफिकेट नहीँ लग पाने से अभी रिजल्ट रूका है ।आपके नंबर ये रहे ।
कहते हुये संधू सर ने पर्चा थमा दिया । सुमेधा पढ़ते ही खुशी से उछल पङी । थैक्यू सर कहती हुयी वह स्टिक के सहारे कॉमन रूम की तरफ चल पङी । सुमेधा को देखकर सबने हाथ हिलाये हाय हैलो कैसी हो । सबको एक शांत मुसकराट से अभिवादन देती हुयी वह कॉमन रूम में थम्म से जा बैठी । बाई ने मशीन से ठंडा पानी दिया तो उसे कुछ रुपये देकर माली से तीन गिलास जूस मँगाय तीनों ने पिया । माली ने ढेर सारे नारंगी गुलाब सुमेधा को दिये । उसका प्रिय रंग सफेद नारंगी के सब शेड । लङके हुल्लङ मचा रहे थे और ट्रीट दो कॉंन्ग्रेच्युलेशन के वाक्य हवा में उछल रहे थे । कुछ पत्रिकायें देखने के बाद वह वापस पार्किंग की तरफ जा रही थी । और हाथ में ।साप्ताहिक हिंदुस्तान  सारिका धर्मयुग नवनीत सर्वोत्तम के ताजे  का अंक थे जो कॉलेज के वाचनालय से अपने नाम पर इश्यू करवाये थे । वह पढ़ती हुयी धीरे धीरे घने पेड़ो के बीच बनी पतली गैलरी पर चली जा रही थी । कि धङाम से किसी से टकरा कर गिर गयी और किताबें बिखर गयीं । गिरने की वजह थी बिना छङी के चलने की धीमी कोशिश सामने शेखर की टीम का एक काला कलूटा लङका पान से लाल दाँत चमका रहा था । बजाय सॉरी के वह ढीठता से मुस्करा रहा था । और लगातार पान चबा रहा था।

ओय जंगली बिल्ली आज ये पतली गली से कैसे?चल हम पहुँचा दें कहते हुये लङके ने  स्टील की चैन पहने अपना मोटा हाथ सुमेधा के कंधे पर रख दिया ?  । सुमेधा समझ गयी पूरे साल कुछ भी ना बोलने वाला ये घूरता रहने वाला लङका आज क्यों जानबूझ कर टकराया क्योंकि वह लँगङी और घायल है । लेकिन यही उसकी गलती थी ।सुमेधा का बाँया हाथ हवा में घूमा और लङका धरती पर था । वह फिर उठना ही चाहता था कि छङी का भरपूर प्रहार दाँयें हाथ से टाँगों पर पङा । और एक टाँग पर कैराटे की हमलावर मुद्रा में तीखी मुसकान दबाये सुमेधा उंगली से इशारा कर रही थी उठ उठ उठ । मगर लङके को आभास हो गया था कि उससे भयंकर भूल हो गयी वह
दीदी सॉरी दीदी सॉरी कहके हाथ जोङता हुआ पीछे की तरफ खिसक रहा था और टकराया पीछे आते शेखर से ।
--दादा बचा लो । ये छोकरी अपने को अकेला पाकर मार्शल आर्ट का रौब दिखा रही है ।
कहता हुआ लङका शेखर के लंबे चौङे ज़िस्म के पीछे छिप गया ।
--ये क्या बचपना है सुमेधा!!!
तुम्हें पता है इस रास्ते पर लङकियाँ और टीचर नहीँ आते जाते!!!  अक्सर टपोरी यहीँ लॉन में बैठते हैं कॉलेज क्लास बंक करके!!!
शेखर के सवाल थे या सूचना । सुमेधा को लगा वह कुछ आधिकारिक ढंग से बोल रहा है । पर क्यों । आज उसके चेहरे पर कई दिन की बढ़ी दाङी थी और सफेद शर्ट सलवटों से भरी सफेद बेलबॉटम पर घास के तिनके थे बाल बिखरे और बेतरतीब बढ़े हुये । सुमेधा ने देखा उसकी आँखें भारी भारी और कुछ लाल थीं जैसे नशा किया हुआ हो । अशोक कचनार अमलताल और गुलमोहर की छाया और धूप के टुकङों के बीच वह कोई भटका यात्री सा लग रहा था । बे झिझक उसने सारी पत्रिकायें समेटी और छङी लाकर हाथ में थमा दी । सारिका बीच में से खुली थी और सुमेधा की तस्वीर देखकर वह ठिठककर पढ़ने लगा । कहानी "अभिशप्ता"उसने होठों को गोल करके सीटी बजायी ।
--तो आप लेखिका भी हैं????  और क्या क्या है!!!
मोहतरमा!!
उसके इस अंदाज़ पर सुमेधा मुसकुराये बिना न रह सकी । शहदई रंग के बालों से घिरा नशे में तमतमाया शेखर का चेहरा आज कुछ ज्यादा ही सुर्ख हो रहे होंठ सुमेधा ने नज़र हटा ली । वह पूछने लगा
--ऐतराज ना हो तो नाचीज़ को पढ़ने की इज़ाजत दीजिये???
--जी आप रख लीजिये हम बाद में पढ़ लेंगे ।
सुमेधा के साथ पार्किंग तक आया शेखर वहाँ एम्बेसडर में बैठा ड्राईवर बाहर निकल कर दरवाजा खोलने लगा ।
Ek lammbee  kahaani
क्रमशः
©®¶©®¶
Sudha Raje

गज़ल"खनकती धूप की चादर

Sudha Raje
Sudha Raje
खनकती धूप की चादर पे
सुखाया होगा
सिसकती रात ने जो दर्द
भिगाया होगा
आज ही घर में नहीं कोई
बात करने को
आज ही बच्चे ने इक दोस्त
बनाया होगा
शाम खामोश बिना बात
मुङ गयी होगी
मोङ पे तारों ने
"काली है"
चिढ़ाया होगा
रात ओढ़े हिज़ाब दर्द
धो रही होगी
चाँद पे दाग छुपा फिर नज़र
आया होगा
खुश-बयां खुश-रू-वो खुश-
रफ़्तगी में गुम होगा
ख़ू-बहा उसने ख़यानत से
कमाया होगा
नर्म होंठों पे गर्म बात
भी दबी होगी
ख़ूने-दिल रोकने को होंठ
चबाया होगा
उलटी रख्खी किताब पढ़
के रो रही होगी
कोई ख़त उसमें ऱखा फूल
छिपाया होगा
दैऱ के वास्ते थाली में
उदासी रख दी
कोई पत्थर का सनम मिलने
ना आया होगा
©®¶©®
Sudha Raje
Feb
19 .2.
1919

उपन्यास: एक अधूरी गाथा"सुमेधा"भाग4

शराफ़त
कहानी **भाग6
-----
तेज जॉज की आवाजें नीचे हॉल से आनी जब बर्दाश्त नहीँ हुयीँ तो सुमेधा ने फोन किया शाहीन को । शाहीन उसकी क्लासमेट ।
--- आ रही हो क्या?टिकिट मँगालूँ ?कौन सी टॉकीज ?
कुछ देर बाद दोनों सहेलियाँ लेडीज कंपार्टमेंट में "नाचे मयूरी "देख रहीं थीँ
शाहीन उसके विपरीत घुटनों तक लटकती चोटी साँवला रंग किसी क्लासिकल फिल्मी पात्र सी सलवार दुपट्टे कुर्ते में में बङे बङे झुमके खूब सारी चूङियाँ पहनने वाली लङकी । लेकिन दोस्ती जैसे जनम जनम की हो गयी चंद दिनों में ।बात बात पर खिलखिलाती शाहीन अक्सर सुमेधा से कहती --तू मुस्करा तो दे जानेजिगर इतना दमदार चुटकुला किसी को सुनाया होता तो कुर्सी उलट जाती ।
वास्तव में सुमेधा कम ही मुस्कराती हँसती लेकिन जब शाहीन हँसती तो वह भी हँस देती और शाहीन कह उठती -
--सुभान अल्लाह इस मुस्कराहट पर कौन ना मर मिटे या ख़ुदा ।
      कोई मर मिटा था सचमुच मुसकान पर नहीँ उस सर्द खामोशी पर चुपचाप सुलगती अँगीठी सा एक चेहरा सुमेधा का शेखर के जेहन पर जैसे सम्मोहन सा छा रहा था । वह बार बार उस तरफ से अपना ध्यान हटा रहा था लेकिन हाथ में सारिका और कहानी पढ़ते जैसे वह सुमेधा को ग़ौर से देख रहा था
------ज़िंदगी ने भरपूर नजर से शाल्मली को देखा था । परंतु पीछे तक़दीर कुटिल मुस्कान से देख रही थी । दर्द और स्त्री का नाता तो साँस और हवा सा है स्त्री होकर शाल्मली ने दर्द से बचना चाहा । वह प्रेम से बच रही थी । वह दर्द से डर चुकी थी माँ की तरह वह किसी मर्द के बाजू पर अपनी ख्वाहिशों का घर नहीँ बनाना चाहती थी कि जब हाथ हटे तो घर भी न रहे ।----—

शेखर ने पत्रिका गहरी साँस भरकर ऱख दी । सिगरेट सुलगायी और लॉन में आ गया । उसके पिता दुबई में रहते थे । और माँ का देहांत कई साल पहले हो गया था । भाई का कपङों का कारोबार था और भाभी अंग्रेज कभी कभी उसके पास आकर बैठ जाती जब वह सितार या पियानो लेकर बैठ जाता । आज वह लॉन में बैठा ही था कि भाभी आ गयी --शेकर अमको हिंदी मूवी दिकाओ -कुछ सोचता हुआ वह अखबार देखने लगा और भारतीय नृत्य संगीत की दीवानी अपनी भाभी को "नाचे मयूरी"दिखाने ले आया । टॉकीज की बालकॉनी में बिठाकर वह सिगरेट लेने गया ही था कि सुमेधा और शाहीन पर नजर पङी वे दोनों लकङी की दीवार के पार बैठी  पॉपकॉर्न और कॉफी ले रही थीँ । बाहर निकलते समय पार्किंग में भाभी से परिचय कराया और भाभी ने दोनों को घऱ चलने के लिये मना लिया । भाभी को भारतीय सभ्यता सीखने का शौक़ था औऱ  उनकी रूचि शाहीन में थी । कोठी में चाय नाश्ते के बाद भाभी शेखऱ का कमरा दिखाने ले आय़ीं । आलीशान कालीन झाङफानूस फायर प्लेस औऱ विक्टोरियन सोफा सेट । शाहीन की तो आँखें फटी जा रहीँ थीँ लेकिन सुमेधा की रुचि थी रैक में जो किताबों से भऱा था ।
*--आप पढ़ते हो?? अचंभे से सुमेधा ने पूछा ।
हाँ कभी कभी पर ये एक स्टेटस  सिंबॉल का ढकोसला भी है ।
सुमेधा ने बच्चों की तरह ललक कर पूछा
--हम देख ले?
Ek lammbi  KAHANI
क्रमशः
©®¶©®¶
सुधा राजे

गद्यगीत: चिड़िया जंगल तितली

Sudha Raje
Sudha Raje
हम सबमें है एक
कैदी जो बाँध कर
रखा गया किसी अनहोनी की भविष्यवाणी पर
औऱ जब कैद से छूटे
तो जी भऱ दुष्टता की ।
क्योंकि देखी नहीँ थी मुक्ति ।
सोचा यही सत्य है कैद
अँधेरे दर्द।
ये दुषटता जो हम
कहीँ भी करते हैं
किन्हीँ भी मायनों में कम
या ज्यादा किसी के
भी प्रति उसे जज करके
उचित ठहरा लेते हैँ और
वही उचित दूसरे का कष्ट है
तो हम सब ही अपने काले
को सफेद समझते हैँ
किसी का जंगल ग्रे है
तो दुष्टता भी धूसर ग्रे है ये
दुष्टता औरतें औसतन अपने
आप पर पूरूष
स्त्रियों बच्चों बूढ़ो और
अपने से कमजोर पर
किन्ही मायनों में करते हैँ
पशु
जो बहुत मुक्त हैं वे
भी नियम पर चलाने के
दौरान उन
सबकी दुष्टता का शिकार
होते हैँ जो लीक लीक
चलने के जंगल में पलते रहे केवल
कतरन किये पौधे देखे
Sudha Raje
ये बँधे लोग
ही प्रकृति के लिये
खतरनाक हैं
जो भी प्रकृति के
खिलाफ़ है खतरनाक है
हम बगीचे के
पेङों को बेतरतीब बढ़ते
देखना चाहते हैँ
नदियों को बिना बाँध
बिना नहरों के लेकिन जब
ये उन्मुक्त विस्तार
किसी दूसरी प्राकृतिकता के
विस्तार को रोके
वहाँ इसे प्रवाह परिवर्तन
देना ही होगा अन्यथा फूल
तितली चिङियाँ शहद
रेशम मोती कपूर और
लङकियाँ खत्म
हो जायेंगी
मधुमख्खी नहीँ रहेगी चिङिया नहीँ रहेगी तो ये
जंगल हरे नही होंगे
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Sudha Raje
जंगल जब तक है हम
जंगली जब तक हैं तब तक
कविता है कला है
उपयोगितावाद
की तानाशाही नहीँ होती तो ये
किसी भविष्यवाणी के
अंदेशे से कोई ताकतवर
किसी तत्कालीन
निर्दोष
को काली जंज़ीरों में
नहीँ डाल देता । ये ज़ंजीरें
हम सब पर हमारे आकाओं ने
डाली हैं
किसी भविष्यवाणी की आशंका से
कभी दिखती है तन पर
कभी चुभती हैँ मन पर जब जब
जंजीरों से छूट मिलती हैं
मन शूद्र होली खेलता है
भावना स्त्री खोङिया जोगिया और
जिस्म का पुरूष टुल्ली धुत्त
हो पङता है ये
मदिरता कहीँ मदिरा है
तो कहीँ पैशन
©®¶©®¶©®
sudhaRaje
Go Crazy
enjoy Tear celebrate Sorrow laugh  madly cheer  up agony

गद्यगीत:मदिरता का मोक्ष

बच्चे बड़े हो जाते हैं
बड़े बड़े सपने बतियाते हैं ,
लंबे हो जाते हैं कद माँ से ,
बड़े बच्चों की बड़ी बड़ी बातें और बड़े बड़े सपने सुनती मां अकसर उन बड़े बच्चों का शैशव याद करने लगती है ,याद करने लगती है पहली आवाज "माँ"पहली करवट ,पहला उठकर बैठना ,पहला घुटनों चलना ,पहला दाँत निकलना ,पहली बार खड़े होना और चल पड़ना पहली बार ,कमीज पहन पाना बटन लगाना ,जूते की डोरियाँ बाँध पाना और पहली बार साईकिल चला पाना ,पहला अक्षर पढ़ना ,पहली अंकसूची पाना ,विद्यालय का पहला दिन ,पहली बार में अलग दूर दूसरे भवन में बैठकर पढ़ना ,बच्चे बढ़ते जाते हैं ,
माँ
घटती जाती है ,
माँ होने तक के विस्तार के बाद ,
कोई विस्तार बचता ही कब है ?,
न देह का ,
न मन का ,
बड़े बच्चों में समाने लगती है माँ ,
अपना समग्र विस्तार ,समामेलित करती हुयी ,
विलीन होती हुयी ,
घटती हुयी ,
माँ पुन:बड़ी होने लगती है ,
अपने पहले बड़े होने से आगे की यात्रा में ,
देखने लगती है
बड़े होते बच्चों की बड़ी बड़ी बातों में बड़े बड़े सपनों के साथ ,
वह सब जगत ,
जो उसके अपने जीवन की यात्रा में
माँ होने की यात्रा पर निकल पड़ने ,
से बड़े बच्चों की माँ होने तक के बीच ,
कहीं छूट गया था ,
यह पुनर्जीवन सा ही तो है ,
माँ कभी रुक गयी थी बढ़ने के माँ होने को ,
माँ फिर चल पड़ती है ,
बच्चों के भीतर से बढ़ने के लिए ,
माँ को बड़े बच्चे फिर छोटे लगने लगते हैं ,
अपने तन से मन से जीवन से ,
जीवन कम लगने लगता है ,
ओह
इनको बड़ा करने के लिए अभी तो कितना कुछ बढ़ना शेष है !!!!ये बच्चे तो बड़े हुए ही नहीं !!,
,
बच्चे माँ से कभी बड़े नहीं हो पाते ,माँ फिर बढ़ने लगती है ,
,
(NCC के लंबे युवा बच्चों के साथ कल शाम की आत्मीय बातचीत के बाद ,जब लगा ये सब तो मेरे अपने बेटे हैं )
©®सुधा राजे

गज़ल; :मैं जलती रह गयी थी कल

मुझे ऐ ज़िन्दग़ी ज़ीने की मुहलत दे दुबारा से
कि मैं बस  सांस लेने को तरसती रह गयी थी कल

सितारों की चमकती रौशनी बस कल्पना ही थी
कि मेरे अर्श  तक को रात डँसती रह गयी थी कल

जले दामन से आँसू पोंछते भी तो कहाँ तक हम
दरकते कांच की किरचें कसकती रह गयीं थी कल

हवा ने एक ही साज़िश रची थी बस डराने की
बुझा गयी सब चिराग़ों को सिसकती रह गयी थी कल

न इस करवट न उस करवट न सीधे बैठना मुमकिन
कि हर पहलू चुभे खंज़र सँभलती रह गयी थी कल ©®™सुधा राजे

मैं मरती भी भला कैसे मुझे था इश्क़ ज़ीने से
कि हर इक सांस की खातिर मैं जलती रह गयी थी कल ©®™सुधा राजे

मेरे हिस्से के सूरज ने बदल दी राह तक अपनी,
कि मैं बस रात वाले दिन सी ढलती रह गयी थी कल

हवा बेहोश करके यूँ चली गयी साजिशें करने
कि सूखे लब लिये प्यासी मचलती रह गयी थी कल

मेरे हिस्से में कैदे बा मशक्कत दर्द रुसवाई
कि तदबीरें मेरी सारी मचलती रह गयीं थीं कल

बहुत ही सख़्त ज़ां हूँ अब तलक हूँ  ज़िन्दा ऐ लोगो
कि टूटे पर घिसटते पांव चलती रह गयी थी क

मुहब्बत आरज़ू अरमान उल्फ़त आशियाना घर
कि सब के सब छलावे जिसमें छलती रह गयी थी कल

तुझे ऐ ज़िन्दग़ी किस्सा मेरा सबको सुनाना है
कि मैं ज़िन्दा ग़जल लब से निकलती रह गयी थी कल

"सुधा" ये ख़ून के रिश्ते लहू के अश्क़ देते हैं
कि मैं वो इश्क की मूरत पिघलती रह गयी थी कल

हर उँगली उठती गयी मेरे क़िरदार पर टूटी
कि मैं वो इन्तिहाई हद जो गलती रह गयी थी कल
©®™सुधा राजे

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Friday, 29 March 2019

गद्यगीत"नाद बिन्दु रहस्य

अपने भीतर ही एक स्त्री एक पुरूष छुपाये जनमे दोनों
नाद और बिंदु
नाद के भीतर लास्य था लालित्य था ललक थी और लचक थी ।
बिंदु के भीतर साहस था । जिजीविषा थी ।सहनशक्ति और उत्साह था
समान था दोनों में आनंद रति रमण प्रेम आकर्षण और काम
फिर??????
दोनों ने विस्तार किया
और एक दिन नाद को पुरूष होना भा गया । क्योंकि सृजन सिर्फ बिंदु के पास था
आनंद के पार पीङा के पार उपलब्धि के पार दुख का सारा विस्तार जो दोनो में होता बिंदु ने सहर्ष ले लिया । नाद मुक्त हो गया विस्तार को । बिंदु सूक्ष्म होता गया समर्पण को वह जीवित रहा
नाद मर गया खोखले
अहंकार की खाल पर गूँजता नाद बिंदु से मुक्ति पाने की छटपटाहट में निरंतर भीतर को मारता गया । उसके कण कण में ठसाठस्स बिंदु ही बिंदु था
कोमलता से छुटकारा पाने को कठोर परूष रूक्ष होता नाद अपने ही शोर से बधिर हो गया । तब
जब सब सो रहे थे नाद रो रहा था
बाकी सब फौलाद हो चुका था लेकिन हृदय में बिंदु अपनी पूरी कोमलता से विराजमान था
तब से आजतक वह
विपरीत हठयोग में  स्वयं का हृदय दबोचे फिर रहा है
क्योंकि
यही अंतिम कोना है जहाँ वह बिंदु का दास है वह कमजोर
स्त्री का विनाश स्वयम् पुरूष का विनाश लिखकर वह लगातार सोचता है कैसे मारे स्वयम् को बचाकर
Sudha Raje
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