Saturday, 1 November 2014

सुधा राजे का लेख :- " स्त्री और पर्वों का समाजशास्त्र।"

हर बात को नकारात्मक दृष्टिकोण और
"नारी/पुरुषवाद ''के चश्मे से
देखना समीचःन नहीं है । भाईदूज
'इसी का एक उदाहरण है ',बहुत
लोगों का मत है कि इसमें भाई
की श्रेष्ठता जतायी गयी है '
चलिये समझते है '
सर्वप्रथम तो इसकी कथा ',यमुना यम
दोनों भाई बहिन कभी पृथक होकर
रहना नहीं चाहते थे
'यमुना को लगता कि उसके भाई से श्रेष्ठ
पुरुष कोई हो ही नहीं सकता 'और वह
भाई जैसा ही 'वर 'चाहती है
नहीं तो अविवाहित रहेगी और 'यम
'समझाते हैं कि यह असंभव है बहिन
को तो विवाह के बाद घर छोङकर
जाना ही पङेगा और तब यमुना हिमालय
यमुनोत्री से मथुरा वृन्दावन आतीं हैं ।
यम वचन देते हैं कि जो भाई 'इस दिन
'बहिन के घर जाकर बहिन के हाथ से जल
लेकर यमुना स्नान करेगा उसे, और
जो बहिन के घर भोजन करके
दक्षिणा अन्न वस्त्र स्वर्ण धन देकर
बहिन के चरण पूजकर मान सम्मान
करेगा उसे पूरे एक वर्ष अकाल मृत्यु असमय
यमपीङा से "मैं यम "मुक्त
करता रहूँगा ।"बहिन के हाथ से तिलक
करवाकर ही बहिन को दक्षिणा देकर
भी "आज भाई भोजन करे "।
यह परंपरा आज विविध नामों से विविध
प्रान्तों में जारी है ।
आप कुछ भी सोचें परंतु यहाँ देश काल और
परिस्थितियों को ध्यान रखें, बृज
बुन्देलखंड सहित अनेक प्रान्तों में भाई
"छोटी हो या बङी "बहिन के चरण पूजते
हैं और कभी अधोवस्त्र नहीं धुलाते जूते
नहीं उठवाते, जूठा खाना या जूठे बरतन
नहीं छूने देते ।पवित्र व्यक्ति की तरह
हर शुभ कार्य में बहिन आगे रहती है ।
विवाह के समय भी भाई 'धानबोने
'की रस्म के साथ बहिन
की डोली को कंधा देकर "मंगलमय जीवन
की शुभकामना ''करते हैं ।
यूरोप हो या भारत अकसर विवाह के
बाद लङकियाँ घर छोङकर "पति 'के घर
रहने चलीं जातीं हैं ।
राखी "भाईदूज "मधुश्रवा सिमदारा ''
ये बहाने भाई को बहिन के घर चाहे
"स्नेहदुलार या समाज या धर्म या रस्म
लोकलाजभय 'या कर्त्तव्य
जो भी जिसको विवश करे '।
अब से कुछ ही पहले तक 'हर भाई पर ये
भार रहता ही था कि उसे "टीका कराने
जाना है ""
यह त्यौहार केवल बहिन ही नहीं भाई
पर भी समान नियम
रखता था बिना टीका कराये
''पानी नहीं पीना न भोजन करना "।
इसलिये एक दिन पहले ही बहिन के घर
पहुँच जाया करते थे भाई ।
साल में दो भाईदूज मनाई जाती है एक
होली के दूसरे दिन एक दीवाली के तीसरे
दिन । होली वाली दूज पर बहिन मायके
आ जाती और दीवाली वाली दूज पर भाई
बहिन के ससुराल जा पहुँचते ।
यह समय होता है चावल आने और गेंहूँ बोने
का "चावल ज्वार बाजरा ''और बीज
बोने के "बहिन की दक्षिणा के गेहूँ
""लेकर भाई जा पहुँचता ।
मेल मिलाप की खुशी ',हालचाल
का सिलसिला और उपहार का फर्ज़ ये सब
मिलकर बनता दिल से निकला आशीर्वाद
"दुआयें "
कि मेरा वीर जुग जुग जिये और
विजयी रहे ।
नयी फसल बोने का प्रारंभ
देवोत्थानी एकादशी से होता है और
पहला आशीर्वाद "बहिन से
लिया जाता ।
बहिन अभाव में न रहे ।अकेली और
उपेक्षित न रहे ।
दरिद्र और दुखी न रहे ।भाई भूल न जाये
कि उसकी हर शुभ शुरुआत पर सबसे पहले
बहिन का आशीष जरूरी है ।
मनीषियों ने सोच समझकर त्यौहार रचे
।लोगों ने कालान्तर में विकृत कर डाले ।
सब बंधुओं को आज भाईदूज पर
शुभकामना नमन और 'सन्देश कि ""पहल
कीजिये रिश्ता चाहे खून का हो या बस
मानी हुयी बहिन जाकर देखें दूज पर घर
और महसूस करें नवीन
होती रिश्तो की दुनियाँ । यह भी देखना समझना और महसूस
करना सुखद है कि ""जब सब दरवाजे बन्द
हो जाते हैं जाति धर्म और लिंग भेद के
नाम पर 'तब भी भारत में 'केवल रक्त
संबंधी ही नहीं दूसरे जाति मज़हब के लोग
भी भाई बहिन होकर निभा लेते हैं सुख
और दुख 'एक बिना शर्त
की स्थायी मैत्री मतलब --बहिन भाई।
©®सुधा राजे


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