Friday, 19 April 2019

लघु कथा: बाबा भगत जी

गुड्डो के ससुर की मौत पर सारा मुहल्ला तरह तरह से याद कर करके शोक प्रकट कर रहा था। बेटियां आई डिडकारतीं हाय हाय करती बुआएँ भी और सबसे अधिक आस पड़ौस की बूढ़ी औरतें तरह तरह से बखान कर करके रो रहीं थीं।
गुड्डो भी रो रही थी , सबको अचंभा लग रहा था , हर दिन घर भीतर से लड़ने झगड़ने आवाजें आतीं रहतीं थी और गुड्डो ठहरी बदनाम बहू कि न काम काज करती है न दहेज लाई न रूप रंग है न बेटे जनमे ना ही कोई मेहनत मशक्कत का काम करती है रोटी पानी सानी में भी हर तरह से विफल बहू।
गुड्डो से ऐसी ही लाश के सामने पूछ बैठा जेठानी का लड़का धरमिन्दर, चाची तुम क्यों रो रही हो, व्यंग्य ही तो था, गुड्डो समझ गयी
और रोते हुये दहाड़ कर बोली अब क्यों मरा ये खूसट अब तो इसे जीना चाहिए था ये तो मुक्त हो गया मेरी पूरी जिंदगी बरबाद कर गया, मेरी बच्चियों को बचपन नहीं जीने दिया, मेरा दांपत्य जला गया, मैं न बहू न मां न बीबी का सुख ले सकी न समाज में कहीं बैठ उठ पायी,  न ही कहीं मायके सासरे के दावत भोज सभा में हँस गा बजा नाच सकी,  हर समय हाय रोटी हाय रोटी हाय पैसा, ये क्यों किया वो क्यों किया तरह तरह के आरोप, गालियां मार पीट कलह और रात के3 बजे से हंगामा, देर रात तक हाड़ तोड़ मेहनत के बाद बासी बची रूखी खाने पर भी चोरी चकारी छिनाले सब तरह के आरोप, हर तरह का हमला, नीच पने की हर हद पार कर चुका बुड्ढा जब बिस्तर पर पड़ा तो भी बक बक बक करता रहा, गू मूत हमने किये, चुगली तो  भी कुछ नहीं करती की
करता रहा, कभी एक फूटी कौड़ी हाथ पर ना रखी ना कभी दुआ आशीष दिये, पोती बहू सबको बेटे से अलग करके रखा और समाज में हर तरह से बेचारा भोला भगत बना रहा भीतर राक्षस था नौकरी बरबाद व्यापार बरबाद हर तरह की विरासत की चीज वस्तु बेच कर खा गया,  हर तरह से बाहरी औरतों का गुलाम सखा रसिया भीतर क्रूर भयंकर हिंसक नरपशु, साजिशों पर साजिशे करने वाला चटोरा सनकी पागल,
क्यों मर गया अब
ये देख हाथ कटे फट, रूखे बाल फटी बिंवाईयां
अब क्या लायक रही मेरी जिंदगी! !
न एक दिन दुलहन रह सकी मेहदी लगाये न दो दिन जच्चा बनी रह कर लेट सकी24 घंटे पहले पूरी सेंक कर गयी बच्चा जनने के36 घंटे बाद ही रोटी थेपने पर लगा दिया।
नरक का कीड़ा कहीं का
क्यों मर गया रे तू
अब इस बरबाद जिंदगी का करना ही मुझे क्या है।
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सब तरह तरह से चर्चा कर रहे थे देखा,  बड़ी दुष्टन है, लाश पर भी नहीं बख्शा बुड्ढे को,
धरमिन्दर को याद आया चाची का फटा सिर बहता लहू और बाहर आकर हाय हाय करके अपने जांघ पर बहू के दांतों के निशान दिखाकर गंदी गंदी बातें बकता बाबा भगत
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©®सुधा राजे

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